संदर्भ—कबीरदास बाह्याचार के कारण उत्पन्न ससार की दुर्दशा का वर्णन करते हैं।
भावार्थ—हे प्रभु ससार के लोगो के आचरण (ससार की दुर्दशा) देखकर ही मेरा मन आपकी ओर आकृष्ट हुआ है। इससे मैं दिन रात आपके गुणो मे रमा हुआ हूँ (आपकी भक्ति मे तल्लीन हो गया हूँ)। कोई वेद पाठ मे भूला हुआ है, कोई ससार के प्रति उदासीन होकर घूमता है, कोई निरन्तर नग्न बना हुआ रहता है, और कोई योग की युक्तियो से (हठयोग की साधना द्वारा) शरीर को ही अपने सुखाता है। ऐसे व्यक्ति राम-नाम मे लवलीन नही रहते हैं। कोई भिखारी बन जाता है और कोई दानी बना हुआ दिखाई देता है। कुछ ऐसे साधु हैं जो कोपीन तो धारण किए हुए हैं, परन्तु (वामाचार का अवलम्बन करते हुए) शराब पीते हैं। कोई तत्र-मत्र एव जडी-बूटियो की साधना करता है और कोई प्राणायाम की साधना करता है और कोई प्राणायाम की साधना करके पूर्ण सिद्ध होने का दम्भ करता है। कोई तीर्थ-व्रत करके अपने शरीर पर विजय प्राप्त करने का प्रयत्न करता है। वाह्याचारो मे विश्वास करने वाले ये व्यक्ति राम-नाम से प्रेम नही करते हैं। कोई धुएँ मे घुट-घुट कर अपना शरीर काला कर देता है। परन्तु राम नाम के बिना इस प्रकार की साधनाएँ करने से मुक्ति की प्राप्ति नही होती है। सत्गुरू ने विचार करके तत्व की बात बताई है। हृदय में निर्भय अवस्था का विस्तार करने वाले परम तत्व को ग्रहण करो। कबीर कहते हैं कि (गुरु के उपदेशानुसार आचरण करके) अब मैं वृद्धावस्था और मृत्यु के प्रति निश्चल हो गया हूँ अर्थात् इनके भय से मुक्त हो गया हूँ। अब मेरे ऊपर राम की कृपा हो गई है।
- अलकार—(i) अनुप्रास—मन मोह्यौ मोर। नगिन निरतर निवास।
- (ii) विरोधाभास—कलापी सुरापान।
- (iii) पदमैत्री—तत मत।
- (iv) तद्गुण की व्यजना—धोम घोटि तन हूहि स्याम।
विशेष—(i) वाह्याचारो का विरोध है। राम-नाम के महत्व का प्रतिपादन है।
(ii) 'वैराग्य' की व्यजना है।
(३८७)
सब मदिमाते कोई न जागा,
ताथै सग ही चोर घर मुसन लाग॥ टेक॥
पंडित माते पढि पुरांन, जोगी माते धरि धियांन॥
सन्यासी माते अहमेव, तपा जु माते तप कै भेव॥
जागे सुक उधव अकूर, हणवत जागे लै लगूर॥
सफर जागे चरन सेव, कलि जागे नामा जैदेव॥