सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/५२६

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
ग्रन्थावली]
[८४१
 

प्राप्त करूगा और मैं इस प्रकार कर्मो को ज्ञान की साधना मे परिणत करता हुआ मृत्यु का आलिंगन करने को सदैव तैयार रहूँगा।

कुम्हार होकर मैं सुन्दर वर्तन बना दूँगा। धोबी होकर मैं कपडो का मैल अच्छी तरह धो दूँगा। चमार होकर मैं चमडा जैसी घिनौनी वस्तु को अच्छी तरह रँगूगा और इस प्रकार जाति-पाँति और कुल के कारण उत्पन्न हीनत्व भावना को समाप्त कर दूगा। तैली होने पर मैं अपने शरीर को कोलू बनाकर उसमे पाप-पुण्यो को पेरूँगा तथा भक्ति रूपी तेल निकालुँगा। अपनी पाँचो इन्द्रियो को कोल्हू का बैल बना दूँगा और राम-प्रेम की रस्सी से नाथ कर उसे (पचइन्द्रिय रूपी बैल) को भक्ति के सीधे मार्ग पर चलाऊँगा। क्षत्रिय होने पर मैं विवेक की तलवार चला दूँगा तथा योग एव ज्ञान दोनो को सिद्ध करूँगा। (विवेक पूर्वक दुष्टों को दण्ड दूँगा तथा दण्ड निर्धारित करते समय तटस्य की भाँति व्यवहार करूँगा। यही ज्ञान एव योग की साधना है।) नाई होने पर अपने मन की समस्त वासनाओ को मूड दूँगा। बढई होकर मैं कर्मों के वधन को काटूँगा। अवधूत होने पर मैं इस शरीर के मल को धोकर साफ करूँगा और बधिक के रूप मे इस वासनामय मन को ही मार डालूँगा। व्यापारी बनने पर मैं परम तत्त्व का व्यापार करूँगा। जुवारी होने पर मैं मृत्यु भय को ही दाव पर लगाकर हार जाऊँगा (मैं अपने शरीर की नौका और मन का केवट एव जिह्वा की पतवार बनाकर भव-सागर के पार जाऊँगा। कबीर कहते हैं कि इस प्रकार मैं स्वय तिरूँगा और अपने पूर्वजों (अन्य व्यक्तियो) का भी उद्धार कर दूँगा।

अलंकार—(i) रूपक-तन कोल्हू, राम जेवरिया। पच बैल तन करि डारूँ।
(ii) भौ सागर।
(iii) अनुप्रास—तरिहै, तिरूँ, तारूँ।

विशेष—(i) कर्म की महिमा का प्रतिपादन है। निष्ठापूर्वक कार्य ही मोक्ष का साधन बनता है। "योग की कर्मसु कौशलम् (गीता)

(ii) कबीर की यह मान्यता प्रकट है कि सभी जातियो के व्यक्ति अपने व्यावसायिक कर्मों को आध्यात्मक रूप प्रदान करके परम पद के अधिकारी बन सकते हैं। यही समन्वय एव तत्त्व दृष्टि है। वह स्वय जुलाहे थे और अपने कर्म को निष्ठापूर्वक करते हुए परमपद के अधिकारी बने थे।

(iii) इस पद मे सभी जातियो के कर्मों का साधना-परक अर्थ किया गया है। व्यक्ति चाहे जिस सामाजिक स्थिति मे हो उसे ईश्वर-भक्ति का पूर्ण अधिकार एव अवसर प्राप्त है। यह मान्यता भारतीय दृष्टिकोण के अनुरूप है। तुलना करें—

(क) श्रेयान्स्वधर्मो विगुण परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधन श्रेय परधर्मो भयावह.।

श्री मदभगवद्गीता, ३/३५