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पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/५२८

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ग्रन्थावली]
[८४३
 


(ii) कबीर के ऐसे कथनो को अर्थवादी ही मानना चाहिए। इस पद मे वर्णित घटनाओ को कबीर ने सत्य माना हो—यह आवश्यक नही है। भगवान की शक्ति करुणा आदि गुणों की व्यजना ही उन्हे अभिप्रेत है। कबीर की भगवान की दयालुता, भक्त वत्सलता आदि मे आस्था थी इसमे कोई सदेह नही है। उन्हे हम सगुणोपासक मान सकते हैं, परन्तु तुलसी सूर प्रभृति भक्त कवियो की भाति साकारो-पासक नही मान सकते हैं। और फिर बात वही है। भारतीय मन-मानस को प्रभावित करने के लिए पौराणिक आख्यानो की चर्चा के बिना काम नही चल सकता है।

(३९१)

विष्णु ध्यांन सनान करि रे, बाहरि अंग न धोइ रे।
साच बिन सीझसि नहीं, कई ग्यान हृष्टै जोइ रे॥ टेक॥
जंजाल मांहैं जीव राखै, सुधि नही सरीर रे॥
अभितरि भेदै नही, कांई बाहरि न्हावे नीर रे।
निहकर्म नदी ग्यान जल, सुनि मडल मांहि रे॥
औधूत जोगी आतमां, कांई पेणै सजमि न्हाहि रे।
इला प्यगुला सुषमनां, पछिम गगा बालि रे॥
कहै कबीर कुसमल झड़ै, कांई मांहि लौ अग पषालि रे।

शब्दार्थ—अभिअन्तरि=आभ्यन्तर हृदय, मन। सीझसि=सिद्धि है। जोइ=दिखाई देता है। औधूत=अवधूत साधक, हठयोगी साधक। सजाम=सयम। कुसमल=पाप। झडै=घुल जाएँगे। पषालि=घोले। बालि=सुषुम्ना। पछिम=सुषुम्ना। गंगा=इडा।

सन्दर्भ—कुछ साधक बाह्य साधनो एव साधनाओ मे व्यर्थ समझ एव शक्ति खोते रहते हैं और अन्तरात्मा को निर्मल नही बनाते हैं। कबीरदास इन्हीं को सावधान करते हैं।

भावार्थ—कबीरदासजी शरीर को मल-मल कर स्नान करने वाले साधकों को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि विष्णु-ध्यान का स्नान करो बाहर से अगो को मत धोते रहो। भाव यह है कि पानी से शरीर के बाह्यागो को धोने से कोई लाभ नही होगा भगवान् का ध्यान करके अपने मन को निर्मल बनाना ही मुख्य काम है। सत्य के बिना सिद्धि की प्राप्ति नही होती है अत ज्ञान दृष्टि से देखने का प्रयत्न क्यो नही करते हो? तूने अपने जी को जगत् के जजाल मे डाल रखा है और तुझको अपने शरीर का भी होश नही है। भाव यह है कि तू विषय के मोहवश अपने शरीर के स्वास्थ्य के प्रति भी असावधान हो गया है। अपने अन्दर प्रवेश नही करते हो अर्थात् आत्म-चिन्तन से विमुख हो। ऐसी स्थिति मे बाहर जल से क्या स्नान करते हो—बाहरी टीमटाम से कोई लाभ नही है। शून्य मण्डल मे निष्काम कर्म की नदी बहती है उसमे ज्ञान का जल है। जो योगी सयम के द्वारा उस नदी में स्नान करता