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पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/५३

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( ४२ )

                 ( २ )

सौना सज्जन साधु जन,टूटि जुरै सो बार ।

दुर्जन कुम्भ कुंमार का एकै धका दरार ॥

                 ( ३ )

मूरख से क्या बोलिये सठ से कहाँ बसाय ।

पाहन में क्या मारिये चोखा ती र नसाय ॥

                 ( ४ )
लिखा लिखी की है नही देखा देखि की बात ।

दूल्हा दुलहन मिलि गये फिकी पडी बरात ॥

   इन साखियो में कल्पना औचित्यपूर्ण प्रतीत होती है ।
  आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने भाव समन्वित कल्पना को सच्ची कवि कल्पना माना है । सच्ची कल्पना वही है जो अन्तस के शुद्ध भावों को जागृत कर दे तथा तत्संबन्धित भावों को पूर्णतया व्यंञित कर दे । सन्तों की कल्पना अनुभूति और भावुकता के आधार पर सज्जित है, इसलिए वह प्रभावित करने की शक्ति और भाव-व्यंजकता से सम्पन्न है । उनकी कल्पना और वर्ण्य विषय जन जीवन से ग्रहण किए गए हैं। इसलिए उनमें भाव व्यंजकता है । कबीर की भाव व्यंजकपूर्ण कतिपय उदाहरण यहाँ दिये जाते हैं ।
 
                 ( १ ) 
                 

माली आवत देखकर कलियन करी पुकार ।

फूलेर फुले चुन लिए काल्हि हमारी बार ॥

                 ( २ ) 

पानी केरा बुदबुहबुदा अस मानुस की जात ।

देखत ही छिप जायगा ज्यों तारा परभात ॥

साहि्व तुमहि दयाल हौ, तुम लगि मेरी दोर ।

जैसे काग जहाज को , सूझे और न ठौर ॥

इन साखियो मे नश्वरता तथा आत्म समर्पण का भाव व्यजित हो उठता है । यही है कवि की कल्पना की सफलता । कबीर की कल्पना शिक्षित अशिक्षित को प्रभावित करने मे समर्थ है ।

मानव के ह्रुदय एव मस्तिप्क मे ऐसी अनेक बाते जन्म प्रहण करती रहती है । जिनकी अभिव्यक्ति वह सामान्यता व्यवहत भाषा के मध्यम से नही कर सकता है । ऐसी ह्र्दयानुभुति विम्त्रो या संकेतो द्वारा भी नहीं अभिव्यक्त्त हो सकती है । इसी