- (ii) वक्रोक्ति—कौन गुणा।
- (iii) उल्लेख—निज अमृत सार।
- (iv) पुनरुक्ति प्रकाश—सुमिर सुमिर।
- (v) सभंग पद यमक—दासनि दास।
विशेष—(i) अनन्य भक्ति का प्रतिपादन है।
(ii) मृग, मीन, भृगी परम्परागत प्रेम-प्रतीक हैं।
राग सारंग
(३९४)
यहु ठग ठगत सकल जग डोलै,
गवन करै तब मुषह न बोलै॥ टेक॥
तू मेरौ पुरिषा हौं तेरी नारी, तुम्ह चलतै पाथर थै भारी॥
बालपनां के मीत हमारे, हमहि लाड़ि कत चले हो निनारे॥
हम सुं प्रीति न करि री बौरी, तुम्ह से केते लागे ढौरी॥
हम काहू संग गये न आये, तुम्ह से गढ़ हम बहुत बसाये॥
माटी की देही पवन सरोरा, ता ठग सूं जन डरै कबीरा॥
शब्दार्थ—ठग=जीव। नारी=देह से तात्पर्य है। पाथर=पत्थर। थै भारी=से भी अधिक कठोर। निनारे=न्यारे, अलग। ढौरी=लगन। गढ=अड्डा।
सन्दर्भ—कबीर जीवन की निस्सारता का निरूपण करते हैं।
भावार्थ—यह जीव रूपी ठग समस्त ससार को ठगता हुआ घूमता है। यह शरीर का आश्रय लेकर ससार के सुखो को भोगता है और फिर शरीर को छोड कर चला जाता है। (जाते समय यह शरीर के प्रति निर्मोही हो जाता है) और शरीर से मुंह से भी नही बोलता है। इस समय यह काया उससे कहती है कि तुम मेरे पुरुष (पति) हो और मैं तुम्हारी आश्रिता पत्नी हूँ। तुम इस पत्थर से भी अधिक कठोर बन कर चले जा रहे हो? तुम तो हमारे बालकपन के मित्र हो। तुम हमसे अलग होकर कहाँ जा रहे हो? जीव उत्तर देता है कि, "हे पगली हमसे प्रीति मत करे। तुम्हारी जैसी न मालूम कितनी नारियो से हमने लगन लगाई है। हम किसी भी शरीर के साथ न तो आए हैं और न किसी शरीर के साथ जाते ही हैं। हमने तुम्हारे जैसे काया रूपी अनेक अड्डे बसाए हैं (हम तो अड्डे पर टिकते हैं। और चले जाते हैं। जिस ठग रूपी जीव की काया स्थूल मिट्टी की भाँति नश्वर है तथा जिसका प्रेरक तत्त्व हवा की तरह अस्थिर है, उससे भगवान का भक्त कबीर बहुत डरता है, अर्थात् उसके प्रति कबीर बिल्कुल आसक्त नहीं हैं।
- अलंकार—(i) सभग पद यमक—ठग ठगत।
- (ii) व्यतिरेक—पाथर थै भारी।
- (iii) रूपक—माटी सरीरा।