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पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/५३८

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ग्रन्थावली]
[८५३
 

जन्म व्यर्थ ही व्यतीत हुआ जा रहा है। तू राम का भजन कर (जिससे तेरा कल्याण हो।)

अलकार—(i) गूढोक्ति—कहा बात।
(ii) वक्रोक्ति—कहा लै आयो जात।
(iii) उपमा—ज्यूँ बनि हरियल पात।
(iv) दृष्टान्त—रावण बिहात।

विशेष—(i) ससार और उसके सम्बन्धो की असारता का प्रतिपादन है।

(ii) जीवन की क्षण भगुरता की व्यजना है।

(iii) 'निर्वेद ' एव वैराग्य की अभिव्यक्ति है।

(४०१)

नर पछितागे अधा।
चेति देखि नर जमपुरी जैहै, क्यू बिसरौ गोब्यंदा॥ टेक॥
गरम कुंडिनल जब तू बसता, उरध ध्यान ल्यौ लाया।
उरध ध्यांन भूत मंडलि आया, नरहरि नांव भुलाया॥
बाल बिनोद छहूं रस भीनां, छिन छिन मोह बियापै।
बिष अमृत पहिचांनन लागौ पांच भांति रस चाखै॥
तरन तेज पर त्रिय मुख जोवै, सर अपसर नही जांनै।
अति उदमादि महामद मातौ, पाप पुनि न पिछांनै॥
प्यंडर केस कुसुम भये धौला, सेत पलट गई बांनीं।
गया क्रोध सन भया जु पावस, कांम पियास मदांनीं॥
तूटी गांठि दया धरम उपज्या, काया कवल कुमिलांनां।
मरती बेर बिसूरन लागौं, फिरि पीछै पछितांनां॥
कहै कबीर सुनहुँ रे संतौ, धन माया कछू संगि न गया।
आई तलब गोपाल राइ की, धरती सैन भया॥

शब्दार्थउरध ध्यान=ऊपर को ध्यान, भगवान मे ध्यान। मृतमडलि=मृत्यु-लोक। तरण=तारुण्य, जवानी। सर अदसर=अवसर कुअवसर। प्यडर=पाडुर=भूरा। पावस=आदि, दया धर्म की बात करने लगा। गाँठ=अहकार की गाँठ। बिसूरन=वेदना से दुखी। मदानी=मद पड गई।

सन्दर्भ—पूर्व पद के समान।

भावार्थ—अरे अधे मनुष्य, अपने इन कर्मों के फल स्वरूप तुझको अन्त मे पछताना पडेगा। तू सचेत होकर देख। तुझको यमपुरी जाना है। तुम गोविन्द को क्यो भूल गये हो? जब तुम गर्म कुण्ड मे थे तब तुमने (उसके कष्टो से त्राण पाने के लिए) भगवान मे ध्यान लगाया। फल स्वरूप तुम उससे निकलकर इस मृत्यु लोक मे आ गए। यहाँ आकर तुमने हे मानव फिर हरि का नाम (अथवा नृसिंह भगवान को) भुला दिया है। बाल्यावस्था मे क्रीडाएँ करते हुए तुमने छओ रसो के