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पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/५३९

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[कबीर
 

कबीर भोजन का स्वाद लिया। धीरे धीरे करके तुम मोह मे फँसते गये। जब तुम बडे हुए तो तुमको कटु और मधुर की पहचान होने लगी। इस समय तुम पाँचो इन्द्रियो के विषय रस का भोग करने लगे। जवानी की तेजी प्राप्त होने पर तुम स्त्री के मुख की ओर टकटकी लगाए रहे और उसका भोग करते समय तुमने अवसर कुअवसर का ध्यान नही रखा। उस समय तुम अत्यन्त उच्छृंखल (विवेक शून्य) होकर आपे के बाहर हो गये तथा तुम्हे पाप-पुण्य का विवेक नही रहा। केश भूरे होकर पुष्पो की भाँति एक दम सफेद हो गये। और वाणी मे भी फर्क आ गया। बात पीछे आने वाला क्रोध समाप्त होगया और हृदय दया रूपी पावस ऋतु से गीला रहने लगा (दैन्य आगया) काम की प्यास भी मंद पड़ गई। अहंकार की गाँठें समाप्त हो गई और स्वय के प्रति दया एव करुणा के भाव जाग्रत होने लगे। (इस वृद्धावस्था मे) कायारूपी कमल मुरझा जाता है। मरते समय पश्चाताप की वेदना से दुखी होता है, अपने अतीत पर पछताने लगता है। परन्तु इस समय पछताने से क्या होता है? कबीरदास कहते हैं कि हे सतो। सुनो, धन, सम्पत्ति (आसक्ति के विषय) कुछ भी तुम्हारे साथ नही जा सकेगा। जब राजा गोपाल का आदेश आता है, तब प्राणी को उसी समय धरती पर सो जाना पड़ता है।

अलंकार—(i) पुनरुक्ति प्रकाश छिन छिन।
(ii) अनुप्रास—तरण तेज विष, पाप पुनि पिछानै।
(iii) भग पद यमक—सर अवसर।
(iv) उपमा—कुसुम भये धौला।
(v) रूपक—काया कवल।

विशेष—(i) पावस—लाक्षणिक प्रयोग है।

(ii) ससार की असारता, निस्सारता एव नश्वरता का प्रतिपादन है।

(iii) 'निर्वेद' की व्यंजना है।

(iv) छ रस मधुर, अम्ल, लवण, कटु, कषाय और तिक्त।

(४०२)

लोका मति के भोरा रे।
जौ कासी तन तजै कबीरा, तौ रांमहि कहा निहोरा रे॥ टेक॥
तब हम वैसे अब हम ऐसे, इहै जनम का लाहा।
ज्यूं जल मै जल पैसि न निकसै, यूं ढुरि मिल्या जुलाहा॥
रांम भगति परि जाकौ हित चित, ताकौं अचिरज काहा।
गुर प्रसाद साध की संगति, जग जीतें जाइ जुलाहा॥
कहै कबीर सुनहु रे सतौ, भ्रंमि परे जिनि कोई।
जस कासी तस मगहर ऊसर, हिरदै रांम सति होई॥

शब्दार्थ—लोका=सगार के लोग। निहोरा=अनुरोध, प्रार्थना।

सन्दर्भ—कबीरदास अंध विश्वासो का खण्डन करते हुए कहते है।