पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/५४

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लिए सूक्ष्म एवं अध्दं स्पष्ट भावो की अभिव्यक्ति के लिए मानव ने प्रतीको की कल्पना की ओर उन्हे जन्म दिया । विद्वानो का कथन है कि मानव सभ्यता के विकास मे प्रतीको का उतना ही योग है जितना हमारे जीवन के विकास मे वायु   या प्रकाश का । प्रतीको का जन्म उद्भव विकास यथाथं वस्थुओ के आधार पर होता है । काल्पनिक वस्तुएं या वे वस्तुए जो निराकार है , उन्हे प्रतीको के माध्यम से नही व्यक्त किया जा सकता है और यदि वे मनाव की विकसित चिंतन शक्ति के आधार पर व्यक्त भी कर डाली गई तो सत्य से दूर , यथार्थ से परे और प्रभावित करने की शक्ति से विहीन होगी । प्रतीको क जन्म  जगत तथा जीवन की अर्थ भूमि से होती है । जीवन के साहचर्य से प्रतीको के अर्थ और प्रतीक का महत्व बढता है । माननीय अनुभवो से निक्ट रहकर प्रतीको मे सजीवता, अर्थ व्यक्तित्व की स्थापना होती है ।
     
      यथार्थ रूप से समक्ष विद्यमान रहने वाले पदार्थों के अतिरिक्त प्रत्यक्ष जगत मे विद्यमान रहने वाले अनेक पदार्थ हैं, जो इन्द्रियगत नही होते हैं फिर भी उनकी कल्पना तक विश्वास, एवं अनुमान द्वारा कर ली जाती है । आत्मा और परमात्मा ऐसे ही विषय है। इनके अगोचर होने के कारण विभिन्न मतवादियो मे भांति-भांति की घारगाएं प्रचलित है। ब्रह्मविद्या के विशेपज्ञ आत्मा को परमात्मा का अश मानते है पर मनोविज्ञान स्वय परमत्मा का अत्मा की सत्ता पर सिध्द करना चहता ह। इनका वरगंन करना हमारी भाषा और सामथ्यं के बाहर है। सन्तो के इन अकथनीय विषयो को काल्पनिक प्रतीको के द्वारा स्पष्ट करने का प्रयत्न किया है। प्रतीक  केवल साहित्य की ही शक्ति नही होते है, वरन् वे जातीय एव सास्कृतिक अनुभव की शक्ति है। हर पीढी आवश्यकतावश नये प्रतीको को गढ लेती है और प्रचीन प्रतीको को नए अर्थ और दृष्टि से देखती है। प्रतीक अपने व्यक्तित्व मे अनेक प्रकार के रहस्यो को समाहित रखता है। उनका कर्तव्य है उन रहस्यो को मधुर ढ्ग से व्यक्त कर देना। प्रतीक भावुकता तथा अनेक प्रकार के ज्ञान के सार तत्व है। प्रतीक रहस्य नही है न रहस्य प्रतीक बन सकते है फिर भी दोनो मे अविच्छिन्न सम्बन्ध नही है। प्रतीको के मध्यम से निरपेक्ष सत्य की। प्रावृति को रहस्यवाद मानना चाहिए। रहस्यवाद प्रत्यक्ष जीवन की अन्त्मूर्त चेतना को प्राप्त करना चाहता है और प्रतीक  उसका आभास मात्र देने का प्रयान करता है । प्रतीक प्रणाली बडी प्रचीन है । दादांनिक विचारो की व्यजना के लिए यदिक ऋपियो ने भी प्रतीको को माध्यम बनाया था । ऋपियो ने उपनिषदो मे ब्रह्म का वरगंन, नूर्य, चन्द्रादि प्रतीको के माध्यम से किया था । गुष्ट्कोपनिषद मे भी एक सत्य पर प्रतीको के माध्यम से विचार स्पष्ट करते हुए कहा गया है 'द्वसुपर्णा‌ सयुजा मरा, या ममनिचदा परिस्वजति' इसी परम्परा मे सन्तो ने भी प्रतीको के माध्यम से अपना रहस्यानुभुति की अभिव्यक्ति