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पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/६२१

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[ कबीर की साखी
 

 

सूरा तबही परषिये,लड़ै धणीं के
हेत।
पुरिजा - पुरिजा ह्वै पड़े, तऊ न छाँड़े खेत६॥

संदर्भ- भक्त रूपी योद्धा को माया जन्य आकर्षणो से लडते रहना चाहिए ।

भावार्थ- भक्त रूपी योद्धा की परीक्षा की कसौटी यही है कि वह ईश्वर की प्राप्ति के लिए माया मोह के बन्धनो से लड़ता रहे। इस युद्ध मे भले ही उसका शरोर टुकडे टुकड़े हो जाय, फिर भी वह रण-क्षेत्र से पीठ न दिखावे, पीछे न हटे ।

शब्दार्थ- परषिये = परीक्षा कीजिए । धरणी = स्वामी, ईश्वर । पुरिजा- पुरिजा = टुकड़े टुकड़े । खेत न छाँड़ै सरिवां, भू दूँ दल माँहिं । आसा जीवन मरण की, मन मे आँखै नाहिं ||१०||

सन्दर्भ- सच्चा शूरवीर युद्ध करता रहता है जय पराजय करता है । का विचार नही

भावार्थ- कबीरदास जी का कथन है कि सच्चा साधक या शूरवीर साधना या युद्ध के क्षेत्र को छोड़ता नही है वह दोनो सेनाओ के मध्य युद्ध करता रहता है । उसके मन मे जीवन और मरण को या जय और पराजय की भावना का अन्तद्वद नही रहता है । वह तो केवल कर्तव्य करना जानता है ।

विशेष– (१) रूपक मलकार ।

(२) तुलना कीजिए गीता के सिद्धान्त से ।

“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषुकदाचन ।”

- गीता

शब्दार्थ- द्वै दल = दोनो दलो, दो सेनायें । अब तौ भूज्यां ही बरौं, मुड़ि चाल्यां घर दूरि ।

सन्दर्भ-सिर साहिब को सौंपता, सोच न कीजै सूरि ॥ ११॥ - ससार की व्याधियो और प्रलोभनो से युद्ध करना ही श्रेयस्कर है ।

भावार्थ- कबीर दास जी कहते हैं कि ईश्वर भक्त जन भक्ति के मार्ग पर्याप्त छागे वढ जाता है तो उसके लिए सासारिक प्रलोभनो मे पड़कर पुनः साधना के मार्ग से लौट पडना उचित नही होता है । उसके लिए तो उस अवस्था मे युद्ध करना ही