आज कहै हरि काल्हि भजौगा, काल्हि कहै फिर काल्हि ।
आजही काल्हि करंतड़ां, औसर जासी चालि ॥५॥
संदर्भ - ईश्वर - स्मरण में विलम्ब करना श्रेयष्कर नहीं होता है ।
भावार्थ - संसार के आकर्षणों मे लिप्त प्राणी कहते हैं कि ईश्वर का कल आ जाता है तो अगले कल के लिए बात फिर स्मरण कल करूंगा और जब टाल दी जाती है और इस प्रकार नष्ट हो जाता है वह वे ईश्वर का आज कल के करते ही सम्पूर्ण जीवन का समय स्मरण कर नही पाते हैं ।
शब्दार्थ - करंतड = करते करते |
कबीर पल की सुधि नहीं, करै काल्हि का साज ।
काल्हि अच्यता झड़पसी,ज्यूं तीतर कौ बाज||६||
सन्दर्भ -इस जीवन मे एक क्षण को भी कोई खबर नही है फिर भी लोग निश्चिन्त ही रहते हैं और मृत्यु के मुख मे जाते हैं । भावार्थ - कबीरदास जी कहते हैं कि एक पल को भी भर मे क्या हो जायगा किन्तु ऐ जीव । सव कुछ भविष्य के खबर नहीं कि क्षरण लिए सज्जित करके रखता है । अचानक ही कल मृत्यु तेरे ऊपर उसी प्रकार झपटेगी जिस प्रकार तीतर के ऊपर बाज झपटकर उसे पकड़ लेता है और मार डालता है ।
विशेष – उपमा अलंकार ।
शब्दार्थ-अच्यता = अचानक ।
कबीर टग टग चोघतां, पल पल गई बिहाई ।
जीव जंजाल न छाड़ई, जम दिया दमांमां श्राइ ॥७॥
सन्दर्भ-आयु घीरे धीरे ढलती रहती है किन्तु फिर भी मनुष्य पेट भरने अतिरिक्त और कुछ नही करता । वह बंधन से मुक्त भी नहीं हो पाता कि मृत्यु को प्राप्त हो जाता है ।
भावार्थ-कबीरदास जी कहते हैं कि जीव ने इस संसार मे माया प्रसूत सुखों के दानों को चुगते अपने जीवन के एक-एक क्षण को नष्ट कर दिया। फिर भी जीव ने माया के जंजाल को नही छोड़ा यहाँ तक कि मृत्यु ने उसके सिर पर आकर कूच का डंका बजा दिया ।
शब्दार्थ - टग टग = करण करण। चोघता = चुगते ।
मैं अकेला ए दोइ
जणां,छेती नाहीं कांइ ।
जे जम आ ऊबरौ,तो जुरा पहूती आई ||६||