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पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/६३३

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[ कबीर की साखी
 

 

सन्दर्भ-जीव नाना प्रकार से अपने ऊपर अभिमान करता है किन्तु उसे यह पता नही कि मृत्यु किस समय उसके अस्तित्व को नष्ट कर दे ।

भावार्थ - कबीरदास जी कहते हैं कि हे जीव । तू गर्व किस बात का करता है, तेरे बालो को तो मृत्यु अपने हाथो में पकडे हुए है। यह भी पता नही कि वह तुझको कहाँ पर मारेगी घर मे अथवा परदेश मे ।

शब्दार्थ - गरबियौ = गर्व करता है ।

कबीर जंत्र न बाजई, टूटि गये सब तार ।
जंत्र विचारा क्या करें, चले बजावण हार ||२०||

सन्दर्भ-शरीर रूपी तंत्री प्राणवायु के निकल जाने पर नही बजती है ।

भावार्थ-कबीरदास जी कहते हैं कि जीवात्मा की शरीर रूपी तंत्री बज नही रही है । उसके समस्त तार टूट गये हैं । जब इसको बजाने वाला प्राणवायु ही निकल गया तो फिर इस यन्त्र का इसमे क्या दोष ? वह बाजे कैसे ।

शब्दार्थ - जत्र = पच तत्वो से निर्मित भौतिक शरीर । वजावरणहार = बजाने वाला प्राणवायु ।

छवरणि धवन्ती रहि गई, बुझि गये अङ्गार ।
अहरणि रह्या ठमूकड़ा, जब उठि चले लुहार ||२१||

संदर्भ- शरीर से आत्मा स्वरूप प्राण वायु के निकल जाने पर उसके समस्न क्रिया कलाप बन्द हो जाते हैं ।

भावार्थ- जब इस भौतिक शरीर से आत्मा रूपी लुहार चला जाता है तो शरीर कान्ति निस्तेज हो जाती है । शरीर रूपी भट्ठी की धौंकनी पडी ही रह गईं इसके अंगारे बुझ गए अर्थात् गरमी निकल गई । घड रूपो निहाई वही पर पड़ी रह गई । सारे साज सामान व्यर्थं पड़े रह गए । सब का सम्बन्ध शरीर मे आत्मा के रहने तक ही था ।

शब्दार्थ -वरिण = भट्ठी, महरणि= निहाई । ठमूकड़ा = हथौडा ।

पंथी ऊभा पथ सिरि, बुगचा बाँध्या पूठि ।
मरणां मुह आगे खड़ा, जीवण का सब झूठ ||२२||

सन्दर्भ-मरण निकट होने पर जीवन मे सब कुछ मिथ्या प्रतीत होता है ।

भावार्थ - आत्मा रूपी पथिक अपनी पीठ पर कर्मों की पोटली बांधकर अनन्त पथ के लिए प्रस्तुत खडा है । मृत्यु उसके सम्मुख खडी है इसलिए उसे अब जीवन की सभी बातें निस्सार प्रतीत होती हैं ।