सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/६३६

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।

 

४७. जावनी को अङ्ग

जहाँ जुरा मरण व्यापै नहीं, मुवा न सुणिये कोइ ।
चलि कबीर तिहि देसड़ै , जहाँ बैद विधाता होइ ||१||

सन्दर्भ - जिस देश मे जरा और मरण का भय नही है कवीर वही चलने की सलाह देते हैं ।

भावार्थ -जहाँ पर बुढ़ापा और मृत्यु व्याप्त नही हो पाती है और किसी की मृत्यु होते नही सुनी जाती है । कबीर दास जी कहते हैं कि ऐ जीवात्मा ! तू उसी देश को चल जहां किसी भी प्रकार की व्याधि न व्याप्त हो सके और यदि हो जाय तो स्वयं विधाता, प्रभु हो वैद्य वनकर औषवि भी कर दें ।

शब्दार्थ - जुरा = जरावस्था, वुढापा ।

सन्दर्भ-भक्त की अनुपम जड़ी बूटी से जीव अमर हो जाता है ।

कबीर जोगी बनि बस्यां, पणि खाये कंद मूल ।
नां जाण किस जड़ी थैं, अमरभये असथूल ॥२॥

भावार्थ -कबीर दास जो कहते हैं कि जीवात्मा योगी बनकर इस संसार रूपी वन मे रहता है औौर नाना प्रकार के कद मूलादिको खोद करके खाता रहता है किन्तु पता नहीं किस जड़ी बूटी के प्रभाव से ( ईश्वर भक्ति रूपी जड़ी से) स्थूल शरीर अमर हो जाता है ।

शब्दार्थ-अस थूल = स्थूल शरीर ।

कबीर हरि चरणौ चल्या, माया मोह थैं टूटि ।
गगन मंडल सण किया, काल गया सिर कूटि ||३||

सन्दर्भ - ईश्वर के चरणो मे अनुराग होने से जीवात्मा मृत्यु के चक्र से छूट जाता है ।

भावार्थ - कबीर दास जी कहते हैं कि सांसारिक बन्धनों का परित्याग करके मैं ईश्वर के चरणो मे गया तब माया और मोह से नाता टूट गया । मैने गगन मण्डल (शून्य, ब्रह्माण्ड ) मे अपना आसन लगा दिया जिसे देखकर काल भी सिर कूटने लगा अर्थात् जीवात्मा मृत्यु के चक्र से छूटकर निकट गया ।

यहु मन पढ़कि पछाड़ि लै, सब आपा मिटि जाइ ।
पंगुल है पिवपिव करै, पीछे काल न खाइ ||४||