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पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/६३८

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[ कबीर की साखी
 

  भावार्थ- समस्त फलो को देने वाला स्वामी (प्रभु) हो साक्षात् वृक्ष है और वह दया के फल याचको को प्रदान करता है जिस कल्याण होता है । ऐसा सुन्दर वृक्ष और सुन्दर फल होते फल से समस्त जीवो का हुए भी जीवात्मा रूपी पंक्षी अन्यत्र इससे भी अच्छा फल पाने के लिए भटकते रहते हैं अर्थात् प्रभु भक्ति छोड़कर सुख प्राप्ति के लिए अन्य प्रयास करते हैं ।

शब्दार्थ- दिसावरा = विदेश, अन्यत्र |

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४८. पारिष कौ अंग

पाइ पदारथ पेलि करि, कंकर लीया हाथि ।
जोड़ी बिछुटी हंस की, पड़या बगां कैं साथि ॥१॥

संदर्भ - माया मोह के कारण जीवात्मा सांसारिक आकर्षणो मे लिप्त रहती हैं ।

भावार्थ- अज्ञानरूपी आकर्षण के वश होकर जीवात्मा ईश्वररूपी रत्न को पाकर भी फेंक देता है और ककड के समान व्यर्थ की वस्तुओ पर आकर्षित होकर हाथ बढ़ाता है । वह, हंस के समान पवित्र आचरण रखने वाले जीवन्मुक्त व्यक्तियो से विमुक्त होकर, नीच आवरण करने वाले पाखण्डी एवं बगुला भक्तो के फेर मे पड़ जाता है ।

शब्दार्थ - कंकर = कंकड, व्यथं की वस्तु । वर्गां = बगुला ।

एक अचंभा देखिया, हीरा हाटि बिकाइ ।
परिषण हारे बाहिरा, कौड़ी बदलै जाइ ॥२॥

सन्दर्भ - मोहाभिभूत जीवात्मा प्रभु के वास्तविक गुणो का मूल्याकन नही कर पाता है ।

भावार्थ - कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार को हाट मे प्रभु-भक्ति रूपी हीरा बिक रहा है । इस हीरे को परखने वाले जौहरी आसानी से नही मिलते हैं और जो मिलते हैं वे इसको परख नहीं पाते हैं जिसके कारण कौड़ी के मूल्य-साधारण मूल्य पर बिक रहा है ।

शब्दार्थ - वाहिरा = अज्ञान ।