पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/६४

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               यह भारतीय साहित्य के लिए नवीन बात थो । इसके पीछे सूफियो की विरहानुभूति का ही प्रभाव है ।        
               सूफियो के दर्शन के अनुसार जीव ब्रहा से मृत्यु के पश्चात् मिल सकता है ।

इससे दूसरा सिद्धान्त यह निकला को शीघ्र से शीघ्र मृत्यु को प्राप्त किया जाय, जिससे ब्रहा से मिलन हो । भारत मे इसके पूर्व बोद्ध भी जीवन के दीपक की बुभ्का देने को अपना परम उद्देश्य मानते थे । जैन साधक तो जीवन दीप बुभ्कने के पूर्व शरीर को अधमरा कर देने के समर्थक थे । मृत्यु का भय है, यह बात अभी तक स्पष्ट शब्दा मे किसी ने भी नही कहा था । परन्तु सन्त कबीर को जब ब्रहा वियोग को तीव्र अनुभूति हुई तो उन्होने यह स्पष्ट कर दिया की मृत्यु त्याज नहो काम्य है:-

                    "जिन मरने से जग डरे सो मेरे आनन्द ।                  
                    कब मरिहु कब देखि हे पुररा परमानन्द ॥"              
               भारतीय  जीवन मे इस प्रकार की विचारधारा को प्रश्रय नही दिया जाता था, परन्तु  इस्लाम  या  सूफी  प्रभाव के कारण  इस  प्रकार कि भावना  का विकास हुआ। भक्त  कवियो ने जीवन की उपयोगिता भगवान की सेवा करने मे ही बताई । उनको 

दृष्टि मे सेवा के सामने मोक्ष प्राप्ति भी तुच्छ था परन्तु कबीर पर इसका प्रभाव न पडा वे फारसी के सूफी कवियो से ही अधिक प्रभावित हुए और मृत्यु को काम्य और मोहक बना दिया । यह प्रभाव हम आधुनिक हिन्दी कविता मे भी देखते है ।

      इस प्र्कार सूफी कवियो के प्रेम की विरहानुभूति एवं प्रिय से मिलन की आकाक्षा से प्रभावित हुए, कबीर ने परमात्मा को पति और अपने को 'बहुरिया' माना है । विरह एव्ं मिलन की बेचैनियो का भी मार्मिक चित्रण किया । 
                    सुफी कवियो द्वारा नर-नारी के शारीरिक मिलन से जीव ब्रहा मिलन को जो उपमा दो गयी, उसका भी प्रत्यक्ष प्रमाण हमे भारतीय भक्ति धारा मे दृष्टिगन होता है। क्षृंगारिकता का गहरा पुट इसी कारण आया है । परन्तु यह भी स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि इस धारा का अगमन मुसलमानो के पुर्व भी अलान मे हो चुका था ।

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     १--इन अनोम तम मे मिलकर
             मुभ्कतो पल भर जाने दो
                  चुना  जाने  दो  देव
                      आज मेरा दीपक दुभ जाने दो ।
                                               महादेवी वर्मा