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पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/६४४

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[ कबीर की साखी
 

 

सन्दर्भ -प्रभु कृपा से जब माया का भ्रम दूर हो जाता है तो जीव को अपने विगत दिनो पर पश्चाताप होता है ।

भावार्थ - कबीरदास जी कहते हैं कि ईश्वर की कृपा के परिणाम स्वरूप मेरा सारा श्रम और सशय सभी नष्ट हो गया । अब मुझे उन दिनो के व्यर्थ जाने का कष्ट हो रहा है जो बिना प्रभु की भक्ति के ही व्यतीत हो गये हैं ।

कबीर आचरण जाइ था, आगै मिल्या श्रज' च ।
ले चाल्या घर परौं, भारी पाया सच ||१२|| ७५२ ।।

सन्दर्भ - जिस जीव का ईश्वर से सम्बन्ध हो जाता है उसको ईश्वर सन्तोष और शान्ति प्रदान कर देता है ।

भावार्थ - कबीरदास जी कहते हैं कि मैं याचना के लिए अपने घर से निकल कर चला ही था कि मार्ग मे मुझे ईश्वर मिल गया जो कभी किसी से ना ही नही करता है । वह ईश्वर मुझे अपने घर की ओर लेकर चल दिया जिससे मुझे अत्यन्त सन्तोष और शान्ति का अनुभव हो गया ।

शब्दार्थ-अजच = जो कभी याचना नहीं करता । संघ = सुख शान्ति ।

५१. दया निरवैरता कौ अंग

कबीर दरिया प्रजल्या, दाभै जल थल झोल |
बस नाहिं गोपाल सौ, बिनसा रखन अमोल ||१||

सन्दर्भ -कर्मों के कारण ससार मे प्राणियों को दुखो की अग्नि मे जलाना पड़ता है ।

भावार्थ -कबीरदासजी कहते हैं कि संसार रूपी नदी मे अग्नि की ज्याला जल उठी जिससे जल, थल, झाड़ खाड़ सभी कुछ जल उठा । उस वासना की अग्नि ने नाना प्रकार के अमूल्य रतनो को नष्ट कर दिया केवल गोपाल ( परम प्रभु) पर उसका कोई वश नही चला ।

शब्दार्थ - दाभै- दग्ध हो गए । झोल = फाड, झखाड |

ऊनमि बियाई बादली बर्सण लगे अंगार |
उठि कबीरा धाह दे, दाभत है संसार ||२||