पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/६५

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                     अब यह भी स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि सूफी काव्य का प्रभाव किस वातायन से आया । ज्ञानाश्रयी शाखा के कवियो के यहाँ प्रेम का आलम्बन निर्गुण व्रह्य था । इसी कारण प्रेम को दीप्त करने का कोई स्पष्ट आधार इन कवियो को न प्राप्त था । अतएव प्रेम भाव की महत्ता का प्रतिपादन करने के लिए कबीर ने  विरह की अनुभूति  पर आश्रित आहो के आधार पर हृदय के फटने, आखो मे  पडने, जीभ मे  छाले पडने के माध्य्म से यह भी स्पष्ट कर दिया कि जो 'शीश उतारे भुइ धरै' वही उसको प्राप्त कर सकता है । इस प्रकार कबीर द्वारा इस्लाम एव्ं हिन्दू संस्कृतियो का समन्वय हुआ । सूफियो से बहुत पुर्व ही कबीर ने प्रेम की महत्ता को स्वीकार करते हुए कहा था :-            
                           "ढाई खाखर प्रेम का,
                         पढ़ै सो पंडित होय ।"