शब्दार्थ - च्यति = चित्त ।
निदक नेड़ा राखिये, आंगणि कुटी बधाई ।
बिन सावण पाणी बिना, निरमल करै सुभाइ || ३ ||
सन्दर्भ - निदक का तिरस्कार नही करना चाहिए ।
भावार्थ - निंदा करने वाले व्यक्ति को अपने से दूर नही वरन् अपने आंगन मे कुटी छवाकर रखना चाहिए। क्योकि वह निन्दा के द्वारा दोषो का परिहार करके विना साबुन और पानी के ही स्वभाव को निर्मल कर देता है ।
शब्दार्थ-नेढ़ा = समीप । साबण = साबुन । सुभाइ = स्वभाव ।
न्यंदक दूरि न कीजिये, दीजै आदर मांन ।||४||
निरमल तन मन सब करें, बकि बकि श्रनहि
सन्दर्भ - निन्दक को दूर न रखकर समीप ही रखना चाहिए । भावार्थ - निन्दा करने वाले को दूर न करना चाहिए बल्कि उसको आदर-सम्मान देकर के समीप ही रखना चाहिए। उसके समीप रहने से यह लाभ होगा कि वह हमारे दोषो को वार वार कह करके सुधारने का अवसर देगा जिससे तनमन सभी कुछ शुद्ध हो जाता है ।
जे को नींदै साध कॅ, सकटि आवै सोइ ।
नरक मांहि जाँमै मरे, मुकति न कबहॅू होई ॥५॥
संदर्भ - साधुओ का निन्दक ईश्वर का कोप भाजन बनता है ।
भावार्थ - जो व्यक्ति सज्जनो को निन्दा करते हैं उन पर संकट आ जाते प्राप्त हो जाता है और इस प्रकार के हैं । वह इस नरक तुल्य संसार मे मृत्यु को मनुष्य की मुक्ति कभी भी नहीं हो पाती है ।
शब्दार्थ- नीदै = निन्दा करता है । मुकति = मुक्ति ।
कबीर घास न नींदिये, जो पाऊँ तलि होइ ।
पड़े जब खिमें, खरा दुहेला होइ ॥ ६ ॥
संदर्भ - तुच्छ से तुच्छ वस्तु की भी उपेक्षा नही करनी चाहिए।
भावार्थ-कबीरदास जी कहते हैं कि घास ऐसी तुच्छ वस्तु को भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए । यद्यपि वह प्रति दिन पैरो के नीचे रौंदी जाती है किन्तु फिर भी जब वह उड़कर आंख मे पट जाती है तो बहुत वेदना पैदा कर देती है ।
शब्दार्थ- खरा = बहुत । दुहेला = वेदना ।