परन्तु मृत्यु से किसी प्रकार नही बचा जा सकता है । अतः हे भगवन् । मैं तुम्हारी शरण में आया हूँ । जन्म-मरण के चक्र से मेरी रक्षा करो ।
( २४६ )
पांडे न करसि बाद बिबाद,
या देही बिन सबद न स्वाद ॥ टेक ॥
अंड ब्रह्मंड खड भी माटी, माटी नवनिधि काया ।
माटी सोजन सतगुर भेट्या, तिन कछू अलख लखाया ॥
जीवत माटी सूवा भी माटी, देखो ग्यांन बिचारी ।
अति कालि माटी मै बासा, लेटे पांव पसारी ॥
माटी का चित्र पवन का थंभा, व्यंद सजोगि उपाया ।
भानं घड़े सवारै सोई यह गोव्यद की माया ॥
माटी का मंदिर ग्यान का दीपक, पवन बाति उजियारा ।
तिहि उजियारे सव जग सूझे, कबीर ग्यांन बिचारा ॥
शब्दार्थ-थभा = स्तम्भ, खम्भा, सहारा । व्यद = बिंदु, वीर्यं । भान = टूटे हुए । बाति = वत्ती । उजियारा = प्रकाशित है ।
सदर्भ - कबीरदास ससार की असारता का वर्णन करते है ।
भावार्थ-कबीर कहते हैं कि अरे पण्डित। तुम वाद-विवाद ( शास्त्रार्थ) मत करो। इस शरीर के विना न शब्द रह जाएगा और न स्वाद रह जाएगा- न तो शास्त्रानं ही रह जाएगा और न शास्त्रार्थ का प्रानन्द ही रह जाएगा । तुम्हारा शास्त्रार्थं तो अबजनित है शरीर और शरीर की स्थिति यह है कि यह समष्टि जगत और इन विश्व का प्रत्येक जश - राभी कुछ मिट्टी है । यह नवनिधियों को भोगने वाला शरीर भी मिट्टी ही है। इसी मिट्टी के संसार में खोते खोजते (विभिन्न नाघनाजों में नटते हुए) सद्गुरु से मेरी भेट हो गई। उन्होने मुझको उस अलक्ष्य परन तत्व का इन्द्र ज्ञान करा दिया। रे मानव । तु ज्ञान पूर्वक मनन करके देख | यह शरीर जीवित अवस्था में भी मिट्टी है और मरने पर भी मिट्टी है । इस शरीर को तट्टीही मन जाना पड़ता है और अन्य समय में यह जीव जमीन पर (मिट्टी में) पैर फैला कर नेट जता है । यह शरीर मिट्टी का ही पुतला है और याच बापू र आधार सा है तथा विनयं एवर को बुदो के संयोग से यह उत्पन दिया गया | भगवान ही वही लीला है कि वही घंटे-रूपी शरीरों को उष्ट सारे और वहाँ दना निर्मा । करता है। करदास ज्ञानपूर्वक विचार कर खोटे जिनिस रीरा मन्दिर में ज्ञान रूपी दीपक जनता है। वाण तीन प्रजादी के के द्वारा ही पूर्ण कार व कन्है