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पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/६८५

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ग्रन्थावली ]
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ही अपनी जड़ काटती है अर्थात् अपने उद्गम स्थल ब्रह्म से अपना सम्बन्ध-विच्छेद कर लिया है । हरि की भक्ति बिना यह देह विषयों के पीछे दौड़-धूप करते हुये नष्ट हो गई है। कबीरदास चेतावनी देते हुयें कहते हैं कि हे जीव, तू काम, क्रोध, मोह, मद ओर मत्सर की ओर ध्यान मत दे और साधुओं की संगति करो तथा राम के नाम का गुणगान करो ।

अलंकार - ( 1 ) उदाहरण - जैसे ...वासी ।

(।।) वक्रोक्ति - जनमत जासी ।

विशेष - (।) जड़ काटी, धव लौटे - मुहावरों का सुन्दर प्रयोग है ।

(।।) व्यक्ति को चाहिए कि वह संसार के प्रति आसक्त न होकर भगवान की भक्ति करे । साधु-संगति एव भगवन्नाम स्मरण के द्वारा मिथ्यात्व का विश्वास होता है और उसके प्रति आसक्ति समाप्त हो जाती है ।

( २५४ )

रे जम नांहि नवे व्यापारी,
जे भरे जगाति तुम्हारी ॥ टेक ॥
बसुधा छांड़ि बनिज हम कीन्हों, लाद्यो हरि को नांऊ ।
रांम नांम की गूंनि भराऊ, हरि के टांडे जांऊ ॥
जिनके तुम्ह अगिवानी कहियत, सो पूंजी हम पासा ।
अबै तुम्हारी कछु वल नाही, कहै कबीरा दासा ॥

शब्दार्थ - जगाति = पेशावर से आने वाले माल पर लगने वाला कर, आयात कर । गूनि = वोरा । टाडै– सार्थ, कारवाँ, काफिला । अगिवानी = आगे आगे चलने वाले । =

सन्दर्भ -कबीर ज्ञान प्राप्ति की दशा का वर्णन करते हैं ।

भावार्थ - हे यम हम वे व्यापारी नही है जो संसार के प्रति आसक्ति का परित्याग करके आत्म बोध में तुम्हारी चुगी दें । मैंने जीवन लगाया है (निज अर्थात् मेरे मन-मानस मे व्यापार किया है) और मैंने हरि नाम की खेप लादी है हरि नाम व्याप्त है । मैंने राम-नाम रूपी सामग्री से जन्म रूपी वोरी भर ली है और हरि भक्तो के काफिले (समूह) साथ (मोक्षधाम ) को जाऊँगा (जिन भगवान के नाम पर तुम जीवधारियों को लिवा ले जाने के लिये आते हो, वे उन भगवान की भक्ति रूपी पूँजी ही हमारे पास है (जिस पर तुम्हारा कोई इजारा नही है) कबीर दास यमराज को सम्बोधित करके कहते हैं कि अब हमारे ऊपर तुम्हारा कोई वश नही चलेगा ( पिछले जन्मो की वात अब नही रही है ।)

अलंकार - ( । ) रूपक -- रामनाम की गूनि ।

( ।। ) गूढोक्ति - नाहिन वैव्यापारी ।

विशेष - ( । ) जे धरै जगाति-अज्ञान के कर्म पाप-पुण्य होते हैं । उनके अनुसार यम जीव का हिसाब-किताब लेकर उसको नरक-स्वर्ग भेजते हैं । परन्तु