वह (सृष्टि कर्ता) सृष्टि के गमरत रूपो ( दृश्यमान जगत ) मे व्याप्त है । यदि परमात्मा (अल्लाह) पवित्र है, तो तू (जीव ) अपवित्र किस प्रकार हुआ अब समझ ले कि संसार मे अल्लाह (परम तत्त्व) के अतिरिक्त अन्य कुछ नही है। कबीरदास कहते हैं कि उस दयालु की जिस पर दया होती है वही उसकी लोला (करनी) के रहस्य को जान सकता है ।
अलंकार - (i) पुनरुक्ति प्रकाश - खोजि खोजि । पढि पढि । वकि वकि ।
- ( ।। ) विशेषोक्ति - कुरानां•••नही जाइ ।
- ( ।।। ) दृष्टान्त - सचु ••• माहि ।
- ( ।v ) सभग पद यमक - पाक नापाक ।
- ( v ) गुठोक्त - तू नापाक क्यूँ ।
- ( v। ) अनुप्रास - करम करीम करनी करें ।
विशेष -(1) वाह्याचार का विरोध है ।
(।।) आत्म-बोध का उपदेश है ।
(।।।) शाकर अद्वैतवादी ब्रह्मवाद का प्रतिपादन है— सैल सूरति माहि सर्वम् खविदरत्र ।अब दूसर नाही कोई- एकोऽह द्वितीयो नास्ति । जीवो ब्रह्मव ना पर । जलह पाक तू नापाक क्यू - 'अह ब्रह्मास्मि' । ( ईश्वर अंश जीव अविनासी । चेतन अमल सहज सुसरासी) । इसी आधार पर सूफी वर्म ने भी अनहलक की आवाज उठाई थी ।
(iv) कर्म करीम का - जानें सोइ । ज्ञानी भक्त की भांति कबीरदास ज्ञान प्राप्ति के लिए प्रभु के अनुग्रह पर अनलम्बित है ।
तुलना किजिए —
यह गुन साधन ते नहि होई । तुम्हरी कृपा पाउ कोइ कोई ।
सोइजानहि जेहि देलु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हहि होइ जाई ।
एवं—:है स्तुति विदित उपाय तफल मुर, केहि केहि दोन पियारे ।
तुलसिदास यहि जीव मोह-रजु, जोई बांध्यो सोइ छोरे ।
(गोस्वामी तुलसीदास )
तथा—विगत गति मानी न परं ।
दूर पति तरि जानक में प्रभु नेकु दरं । - मुरवास
( २५८ )
सालिक हरि कहीं दर हाल ।
पनर जति कर नमन, सुख करि पैमाल ॥ टेक ॥
वित्त उसको दोजा, सुंदर वरात दिवाल ।
पान परवा न जातव, हर जगम जाल ॥