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पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/६९४

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[ कबीर
 



( २६० )

मैं बड़ मै बड़ मै बड़ मांटी,
मण दसना जट का दस गांठी ॥ टेक ॥
मै वावा का जोध हांऊ, अपणी मारी गोंद चलांऊ ।
इनि अहकार घर घर घाले, नाचत कूदत जमपुरि चाले ॥
कहै कबीर करता की वाजी, एक पलक मै राज बिराजी ।

शब्दार्थ -नाटका= नाज टका टका रुपया ( बगला प्रयोग ) । जोध = योद्धा । गीद - गेद । घणे - बहुत से । घाले - नष्ट किए। बाजी – खेल, लीला । पिराजी - राज्य रहित ।

संदर्भ - कबीर संसार की असारता का वर्णन करते हैं ।

भावार्थ—अहकारवश व्यक्ति कहने लगता है कि "मैं बड़ा हूँ, मैं बडा हूँ ।" परन्तु यह बड़प्पन मिट्टी ( व्यर्थ, अत्यन्त अल्प मूल्य ) है । दस मन अनाज एव गाठ में दस रुपए होने के कारण होने वाले बडप्पन का भावार सर्वथा तुच्छ है । मैं चावर का योद्धा है अर्थात् गाँव के मुखिया का कृपापात्र हूँ और जो अपनी मनमानी करता है । इस प्रकार के अहकार के फलस्वरूप अनेक घर ( परिवार ) नष्ट हो गये । ये अहकारी नाचते कूदते मर गए । कबीरदास कहते हैं कि यह सब उस सृष्टिकर्त्ता की लीला है । एक पल के भीतर वह राजा को बिना राज का कर देता है । इस पंक्ति का अर्थ इस प्रकार भी दिया जा सकता है- जब भगवान की बाजी पड़ती है, तब यह एक क्षण में ही सब कुछ उलट-पुलट कर देता है ।

अलंकार- (।) अनुप्रास - प्रथम पंक्ति । घणे घर घाले ।

विशेष - (।) निर्वेद नचारी' भाव की व्यजना । ( ।। ) मुहावरों का प्रयोग- ( ।।। ) वड माटी (।v) बाबा का जोध । (v) अपनी भारी गेंद चलाना । (v।) घर जालना ।

( २६१ )

काहे बोहो मेरे साथी हूँ हाथो हरि केरा ।
चौरासी तब जाके मुख में, सो च्यंत करेगा मेरा ॥ टेक ॥
कहाँ फोन थिये कहो कौन गाजे, कहाँ ये पांणी निसरं ।
ऐसी कना जनत है जाऊँ, सो हम को क्यूं विसरं ॥
जिनि ब्रह्मांड रच्यी बहु रचना, बाच वरन ससि सूरा
पाक पच पुनिम जाकी प्रकटे, सो क्यूं कहिये द्वरा ।।
विनिहरि गिरजे बसन बसन विधि काया ।
नाजन को मो यूँ मिरे, ऐसा है राम राया ॥:
हो का काम न जाने में मरनांगति तेरी ।
कहे सीरप म गया, मति राराष्ट्र मेरो ॥

शब्दार्थ--त्या भारत। सतना। भलाई-