संदर्भ -कबीर दुख निवृत्ति हेतु भगवान की शरण को एक मात्र अवलम्बन मानते हैं ।
भावार्थ-रे राजा राम । मुझसे ससार का मोह छोडते नही बनता है । मेरी भी हालत उस पक्षी की तरह हो गई है जो आकाश में ऊचा उडतो जाता है परन्तु भोजन- वासना के कारण उसका मन पृथ्वी से बँधा रहता है । मन से वासना जाती नही है । इस कारण मोह वा बन्धन टूटता नहीं है । तब आकाश में उड़ने से—ज्ञान-ध्यान से क्या लाभ है ? मे जो काम सुख प्राप्ति के लिए करता है, वे दुख के हेतु बन जाते हैं । जैसे हाथी हथिनी के प्रति मोह के कारण अपने आपको वा देता है तथा कस्तूरी मृग सुगन्ध की वासना के वशीभूत होकर इधर-उवर गटकता रहता है, वैसे ही जीव भी मोह एव वासनाओ के कारण अपने आपको सासारिक प्रपचो मे फँसा देता है तथा अपनी वासनाओं के वशीभूत होकर चारो ओर भटकता फिरता है । कबीरदास कहते हैं कि हे मुरारी । मेरी प्रार्थना सुनो। सांसारिक वासनाओ पर मेरा कोई वश नही चल रहा है । मैं सांसारिक बन्धनों से भयभीत हू तथा यम दूत से डरा हुआ हूँ । इसलिए तुम्हारी शरण मे आया हू ।
अलंकार -(।) उदाहरण - सोगति मनमाही ।
- (।।) अन्योन्य - छूटी न आस ••• फदा ।
- (।।।) गूढोक्ति - लागो काही ।
- (iv) विरोधाभास - जो स
"दुख तेई ।
- (v) सम्बन्धातिशयोक्ति - कहत न •••आवै ।
- (v।) उपमा - कु जर ज्यूं कस्तूरी का मृग ।
( २६७ )
राम राइ तू ऐसा अनभूत अनूपम, तेरी अनभै थै निस्तरिये ।
जे तुम्ह कृपा करौ जगजीवन, तौ कतहू न भूलि न परिये ॥ टेक ॥
हरि पद दुरलभ अगम अगोचर, कथिया गुर गमि विचारा ।
जा कारंनि हम ढूंढत फिरते, आथि भर्यो संसारा ॥
प्रगटी जोति कपाट खोलि दिये, दगधे जम दुख द्वारा ।
प्रगटे बिस्वनाथ जगजीवन, मैं पाये करत विचारा ।।
देख एक अनेक भाव है, लेखत जात अजाती ।
बिह कौ देव तवि ढूंढत फिरते, मंडप पूजा पाती ।।
कहै कबीर करुणामय किया, देरी गलियां बहु विस्तारा ।
राम के नांव परंम पद पाया, छूटै विघन विकारा
शब्दार्थ - अनभै = अनुभूति । गमि अनुभूति द्वारा प्राप्ति । आखि= व्याप्त । जात=जन्मा । अजाती = अजन्मा | विह उम । तत्र = पहले । गलिया = विभिन्न मत पथ ।