नैन का दुख बेन जांनै,नैन का दुख श्रवनां ।
व्यंड का दुख प्रांन जांनै,प्रांन का दुख मरनां ।।
आस का दुख प्यासा जाने,प्यास का दुख नीर ।
भगति का दुख रांम जांनै,कहै दास कबीर ।।
सन्दर्भ-कबीरदास की विरह-व्यथा वर्णनातीत है ।
भावार्थ-भक्त के हृदय की पीड़ा को भगवान राम अच्छी तरह जानते है । उसको किससे कहू और उस पर कोन विश्वास करेगा ? प्रियतम को न देखने के कारण जो दुख होता है,उसका वर्णन वाणी द्वारा किया जाता है । वाणी द्वारा वर्णित दु:ख को सुनकर कानो को दुख होता है अर्थात दुख का वर्णन सुनने वाला दुखी होता है । शरीर के कष्ट को प्राण समझते है और प्राणों की व्यथा का ज्ञान मरने पर हो पाता है । आशा मे कितनी व्यथा समाई रहती है,इसका अनुभव पानी की आशा मे जीवित रहने वाला प्यासा व्यक्ति जानता है । प्यासे व्यक्ति की व्यथा को जल समझता है । कबीरदास कहते है कि भक्ति के कारण उत्पन्न होने वाली व्यथा का ज्ञान राम को ही है । भाव यह है कि जल ही यह जानता है कि उसके बिना उसके प्यासे को कितना कष्ट होता है । इसी प्रकार भगवान राम यह जानते है कि उनके प्रेमी भक्त को उनके दर्शन के अभाव मे कितनी व्यथा होती है ।
अलंकार-(।) निदशंना--नैन का दुख राम जानैं।
- (।।) वत्रोक्ति--कहू काहि को मानै ।
विशेष-(।) लाक्षणिक शैली का प्रयोग है ।
(।।) रहस्य भावना की अभिव्यक्ति है ।
(।।।) मार्मिक व्यथा ५की मार्मिक व्यंजना हैं ।
(।v) शब्द विघान से प्रवाह एवं संगीतात्मकता है ।
(२५७)
तुम्ह बिन रांम कवन सों कहिये,
लागी चोट बहुत दुख सहियै||टेक||
बेध्यों जीव बिरह कै भालै,राति दिवस मेरे उर सालै||
को जांनै मेरे तन की पीरा,सतगुर सबद बहि गयों सरीरा||
तुम्ह से बैद न हमसे रोगी,उपजी बिथा कैसे जीवै बियोगी||
निस बासुरि मोहि चितवत जाई,अजहू न आइ मिले रांमराई||
कहत कबीर हुमकों दुख भारी,बिन दरसन क्यू जीवहि मुरारी||
संदर्भ-कबीरदास की जीवात्मा पत्नी की विरह-व्यथा का वर्णन है।
भावार्थ-हे राम ! तुम्हारे अतिरिक्त मैं अपने मन की व्यथा किससे कहूँ? विरह-व्यया की चोट मुक्मे गहरी लगी है और उसके कारण मुझे बहुत दुःख सहन करना पड रहा है । विरह रूपी भाले ने मेरे जीवात्मा को वेघ दिया है और यह व्यथा रात-दिन मेरे हृदय मे कसकती रहती है। मेरे अन्त;करण मे जो विरह-व्यथा