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पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/७३५

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ग्रंथावली ]
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नही देखा। इम धन-दोलत ने किमी का भी साथ नही दिया। राजा भी इसकी साक्षी(गवाही)हौ। जव जीवात्मा प्राणायाम के द्वारा शुन्य तत्व में लौ लगा कर कीड़ा करता हे,तव उसको सर्वत्र व्याप्त आनन्द रूप सुवर्ण की प्राप्ति होती है। मनुष्य का जन्म वार-वार नही मिलता है। ये जीवन क्षण भंगुर है। ये प्राण किसी समय शरीर को छोड़कर ऐसे चले जायेंगे। जैसे वृक्ष को छोड़कर पक्षी उड़ जाता है। संसार का प्रत्येक प्राणी अपने-अपने रास्ता अकेला ही जाता है। परलोक-गमन के माग मे कोई किसी से नही मिलता है। मूर्ख जीव मनुष्य का जन्म(विषय भोग में) व्यथ ही गवा देता है और कोडी के मूल मे ही उसको खो देता है। जिस शरीर और धन के कारण संसार के लोग अपने आप को भूले हुऐ है और जगत जिसकी रक्षा मे लीन है, उसी माया का परित्राण करो । यह जीवन हाथ की अंजलि मे भरे हुऐ पानी के समान क्षण-स्थाथी है। इसका क्या भरोसा ? कबीर कहते है कि यह संसार व्यथ का प्रपंच है। रे अज्ञानी जीव, तू क्यो नही चेतता है-होश मे आता है?

अलंकार-(।) छेकानुप्रास-धन धधा, माया मिय्यावाद।

(।।)कछ कीजै,राय रसायन,जगत जग। जल जीवन। म्र्र्ख मनिषा।
(।।।)उपमा-हल्र्र ज्यू। जम से। देवल जू। पखी जेम। कोडी ज्यू। जाल अजुरी जैसा।
(।v)वृत्यानुप्रास-चित चेति चतुर, भरमि भूलसि भोली। पडिया पछ्तावै पाछै।
(v)शलेशपुश्ट रूपक-घट।
(v।)वकोक्ति-क्यूं घनेरी। तिहि जगावै।
(v।।)विरोघाभास-जगत नीद उपावै।
(v।।।)दृष्टान्त-जलजत °निदानी।
(।x) रूपक-राम रसाइन।
(x)गढोक्ति ताका भरोस
(x।)पदमैत्री राम नाम ,घघा अघा।

विशेष-(।)जीवन और जगत की असारता का प्रतिपाद्न है।

(।।)'निर्वेद' की मार्मिक व्यंजना है।

(।।।)जीवन की क्षणिकता को व्यत्क करने के लिए जल अजुरी जीवन जैसा बड़ी ही साथक उपमा का प्रयोग किया गया है।

(।v)हस, पवन,हारिक-नाथ सप्रदाय के प्रतीकों का प्रयोग है।

(v)मानेख जनम तन वरवारा। —तुलना करें।


बड़े भाग मानुष तन पावा सुरदुरलभ सद् ग्रन्थन गावा।

(गोस्वामी तुलसीदास)