भावार्थ—रे चित तुम सावधान होकर उस परम तत्त्व का ध्यान करो जिसके चिन्तन से अपने-पराए का भेद नष्ट हो जाता है । मेरे हृदय मे भगवान ने वह ज्ञान उत्पन्न कर दिया है जिससे सम्पूर्ण माया-मोह का बन्धन नष्ट हो गया है। उस परम तत्व के साक्षात्कार की अवस्था मे न नाद है, और न बिन्दु (शरीर ) है । उस अवस्था मे नर, नारी, कुल एव जानि किसी प्रकार का भी भेद नही है । ( वह सम अवस्था है ।) कबीर कहते हैं कि उस परम तत्व का साक्षात्कार सब सुखों का देने वाला है । उस परम तत्व को ज्ञानेन्द्रियो द्वारा नही जाना जा सकता है, उसको स्थूल दृष्टि द्वारा देखा नही जा सकता है, सामान्य बुद्धि द्वारा उसका निरूपण नही किया जा सकता है क्योंकि वह पूर्ण एकत्व ( अभेद को प्राप्त है, और वही सबका सिरजनहार हैं ।
अलंकार - अनुप्रास - चित चेति च्यति, अविगत अलख अभेद ।
विशेष - (।) परम तत्व एवं उसकी अनुभूति अनिर्वचनीय है ।
(।।) 'परा तत्व' के साक्षात्कार की अवस्था मे नाद और बिन्दु के भी न होने की बात कह कर कबीर ने परम तत्व को 'कायायोग' द्वारा प्राप्त अवस्था से भी अतीत बता दिया है ।
( २६८ )
सरवर तटि हसणी तिसाई
जुगति बिना हरि जल पियां न जाई ॥ टेक ॥
पीया चाहै तौ लै खग सारी, उड़ि न सकै दोऊ पर भारी।।
कुंभ लीयै ठाढी पनिहारी, गुन बिन नीर भरे कैसे नारी ॥
कहै कबीर गुर एक बुधि बताई, सहज सुभाइ मिलै रांम राई ॥
शब्दार्थ - तिसाई = तृषिता, प्यासी । खग = पक्षी । ससिनी = आत्मा । जुगति युक्ति, साधना, भक्ति । पीया = पीना । सारी = गमन करने वाला । कुंभ = घड़ा । गुण नाम स्मरण ।
भावार्थ – आत्मानन्द रूपी तालाब के तट पर बैठी हुई जीवात्मा रूपी हसिनी प्यासी है । इसमें आश्चर्य की क्या बात है ? साधना रूपी युक्ति के बिना परमानन्द रूपी जल का पान सम्भव नही होता है । रे जीवात्मा रूपी हसिनी, यदि तू उस जल को पीना चाहती है, तो तू वहाँ तक गमन कर । परन्तु वस्तुस्थिति यह है भाव एव सशय के कारण तेरे दोनो पंख उड़ने मे असमर्थ हैं । कुण्डली रूपी पनि- हारिन साधना रूपी घड़ा लिए खडी है, परन्तु भगवान के नाम-स्मरण रूपी रस्सी के अभाव में वह अमृत - जल नहीं भर सकती है । कबीर कहते हैं कि मेरे गुरू ने इस आनन्दामृत पान की भक्ति रूपी एक युक्ति बता दी है । उसी के द्वारा भगवान राम सहज भाव से प्राप्त हो गए है ।
अलंकार - (।) रूपकातिशयोक्ति - सम्पूर्ण पद । (।।) विरोधाभास - सरवर 'ससाई ।