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पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/७४३

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लो। देर मत करो ।भगवान से मिलने के लिए चल पड़ो कबीर कहते है कि प्राण रहते हुए जल्दी ही भगवान के साथ तदाकार होने का प्रयत्न करना चाहिए ।

अलंकार- रूपकातिशयोक्ति सखि, च्यतामणि।

विशेष-(।) सोवत उदास-इस स्वपन इत जगत मे अचानक भगवत्प्रेम जाग गया और ऐसा प्रतीत हुआ कि पति रुप भगवान मेरे समीप ही आ गए थे। भगवान के इस प्रकार आगमन से अज्ञान की निद्रा समाप्त हो गई। यह वोध हुआ कि मै भगवान से विछुड कर ही इतने दिनो से भटक रही थी। इस आत्मग्लानि के कारण मन का उदास हो जाना स्वाभाविक ही है। यह कहिए कि आत्मवोध के फलस्वरूप मेरा मन संसार के प्रति उदासीन हो गया।

(।।)स्वपन और जागरण के रुक ?कवि ने लौकिक स्तर के दाम्पत्य प्रेम के बिम्बों द्वारा अलौकिक एवं रहस्यवादी प्रेम ज्ञान एवं भाक्ति की समन्वित हृदय एवं रहस्यवादी एव व्यंजना की है।

(।।।) समभाव देखे-

चकई ऱी!चलि चरन-सरोवर जहाँ नहि प्रेम बियोग।
तथा—सुवा चलिवा वन को रस पीजै।
निसि दिन राम नाम को भक्ति भय रुपए अम्रुथ रस पीजे।
जा वन राम नाम अमृत रस श्रवण पाय भूरि लीजे ।

(सुरदास)

(।v)सोवत उदास -इसी कोटी के लौ लौकिक दाम्पत्य प्रेम की अभि- व्यक्ति देखिए-

हौ सपने गई देखन कौ,कहू नाचत न द -जमोम्ति को नट।
वा मुसकाय के भाव बताय के ,मेरोई खैचिखरो पकरो पट ।
तौ लगि गाइ बगाइ उठी,कहि देव,बघुनि,म थ्थौ दधि को मट ।
जागि परी तौन कान्ह कहू,न कदब,नकुज ,न कालिन्दी को त तट ।

(देव)

(३०३)

मेरे तन मन लागी चोट सठौरी ।।
बिसरे गयान बुधि सब नाठी, भई बिकल मति बौरी।।टेक।।
देह बदेह गलित गुन तीनू , अचत अच्ल भइ ठौरी।
इत उत जित कित द्वादस चितवत , यहु भई गुपत गौरी।।
सोई पै जानै पीर हमारी,जिहि सरीर यहु ब्यौरी।
जन कबीर ठग ठग्यौ है बापुरौ,सुनि समानी त्यौरी।।

शब्दार्थ-सठौरी-सही स्थान। ज्ञान-सामान्य ज्ञान ।नाठी=नष्ट् हो गई ।। टगौरी= जादु। ब्यौरी=विवृत,व्यक्त ।सुनि =शून्य। त्यौरी=त्रिकुटी

संदर्भ- -कबीरदास ज्ञान दशा का वर्णन करते है|

भावार्थ- मेरे शरीर और मन पर (गुरु उपदेश एव प्रभु की) चोट ठीक्