सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/७४४

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
७४०]
[कबीर
 

स्थान(मर्म) पर लगी है । इसमें मेरी समस्त लौकिक ज्ञान,एव विवेक नष्ट हो गए है और मेरे बुध्दि प्रभु के विरह मे व्याकुल होकर पागल हो गई है। मेरी देह विदेह हो गई है अर्थात् इस शरीर एव उस के सुखों के प्रति मेरी आसक्ति समाप्त हो गई है और तीनों गुण समाप्त हो गए है। जो अवयव चल रहे थे, वे जहा के तहा स्थिर हो गए है अर्थात् मेरे शरीराँगों ने कार्य करना बन्द कर दिया है शरीर के बारह अंगों की क्रियाएं अस्त-व्यस्त को समझ सकता है जिसके शरीर मे यह पीड़ा व्यक्त हुई हो अर्थात् जिस को यह व्यथा भोगनी पड़ी हो। कबीर दास कहते है कि मै भक्त तो प्रभु प्रेम के जादू रुपी ठग द्वारा ठग लिय गया हूँ और मेरी त्रिकुटी शून्य मे लग गई है, मेरी समस्त चित्तवृत्तियां अन्तर्मुखी हो गई है।

अलंकार - (।) सभग पद यमक - देह वदेह ।

(।।)विरोधाभास- चलत अचल भई ।
(।।।)पदमैत्री इत उतजित कित ।
(।v) रुपक -ठग ।

विशेष-(।)बारह अंग पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कमेर्निद्र्या, मन एव बुद्धि ।

(।।)तीन गुण--सत्व गुण, रजोगुण तथा तमोगुण ।

(।।।) त्रिकुटी - देखें टिप्पी पद स० ३,४,७ ।

(।v)शून्य-देखे टिप्पणी पद स० १६४ ।

(v)सोई वै-व्यौरी "जागे लगे सोई जाने विथा" अथवा दरद न जानै जाके फटी बिवाई ना ।

(v।) सोई व्यौरी ईश्वर प्रेम एव ज्ञान की दशा मे अवधूत व्यक्ति की सांसारिक विषयो प्रति आसक्ति नही रह जाती है। इस से वह संसार के व्यवहार मे पदु न रहकर पागल एवं भुख प्रतीत होते है ।

(३०४)

मेरी अंखिया जा न सुजांन भई।
देवर भरम सुसर संग तजि करि हरि पीव तहां गई ।।टेक।।
बालपनै के करम हमारे,काटे जानि दई ।
वाह पकरि करि कृपा कीन्हीं, आप समीप लई ।।
पानी की बूँद थे जिनि प्यड साज्या,ता सगि अधिक कर ई।
दास कबीर पल प्रेम न घटई,दिन दिन प्रीति नई ।।

शब्दार्थ-जानि=जान्वूभ कर । दई = भगवान । व्यड=शरीर| साजा=बनाया।

संदर्भ-कबीर ज्ञान दशा का वणन करते है । भावार्थ-भगवान के प्रेम मे अनुरक्त जीवात्मा कहती है कि प्रभु-दर्शन