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पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/७४७

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ग्रन्थावली ]
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आपसे न मिल सकने के कारण मेरा मन एक दम गिर गया है । इस उदासी को दूर करने के लिए मैं अपने पति माधव का सान्निध्य चाहती हू । उनकी बाट देखते हुए मैं सारी रात व्यतीत हो जाती है । मेरी शय्या तो बाघ की तरह प्रतीत होती है । जब भी उस पर लेटना चाहती हूँ, तब ही वह मुझको काट लेने को दौड़ती है । हे भगवान, इस दासी की प्रार्थना सुन लीजिए और विरहाग्नि से उत्पन्न इस शरीर की जलन को शांत कर दीजिए । कबीर कहते है कि अगर मुझे स्वामी राम मिल जाएं, तो मैं उनके साथ मिलकर मंगल के गीत गाऊँ वर्णन है ।

अलंकार - (।) पदमंत्री - हिल मिल । तन मन प्रान ।

(।।) रूपक - स्यघ भई है ।

विशेष - (।) प्रभु के प्रति दाम्पत्य प्रेम परक विरह व्यथा का मार्मिक (।।) सूफियों की शैली पर जीवात्मा के विरह की व्यंजना है ।

(।।।) इस पद मे भक्त कवियों की पद्धति पर 'मनोराज्य' की अभिव्यक्ति देखी जा सकती है । यथा-

मैं हरि बिन क्यो जिऊँ री माइ ।

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पिय ढूँढन बन बन गयी, कहूँ मुरली धुनि आइ ।
मीरां के प्रभु लाल गिरधर । मिलि गये सुखदाइ ।
तथा- नन्हीं नन्हीं बूंदन मेहा बरसैं, शीतल पवन सुहावन की ।
मीरां के प्रभु गिरधर नागर, आनन्द-मंगल गावन की ।( मीराबाई)

(IV) जीवात्मा का ब्रह्म से तदाकार हो जाना ज्ञानमागियो के निकट परम पुरुषार्थ है । परन्तु भक्त और रहस्यवादी का दृष्टिकोण थोडा सा भिन्नता के लिए रहता है । वह ब्रह्म के साक्षात्कार से उत्पन्न रागात्मक अनुभूति मे तन्मय होना चाहता है । कबीर के इस पद मे ज्ञान, भक्ति और रहस्य भावना तीनो का समन्वय दिखाई देता है । इस त्रिवेणी का सस्पर्श ही ज्ञानी भक्त कबीर का सर्वस्व है । दाम्पत्य भाव का रूपक इस अनुभूति को व्यक्त करने का सबसे अधिक सफल एव सशक्त माध्यम है । कबीर ने इसी पद्धति का अवलम्वन किया है ।

(v) प्राण समाई -पति परमेश्वर के विभिन्न गुणों मे तन्मय होकर रसास्वादन करने की व्यंजना है ।

(v।) रैन विहाई - ' रैन' का अर्थ यदि अज्ञान मय जीवन की सुन्दर व्यंजना हुई है । कही मोह-निद्रा हो, तो इसके द्वारा अज्ञान निद्रा फिर से सताने लगे - इसी कारण कबीर ने 'चितवत् रैन विहाइ' - वाली बात कही है । यथा-

मैं बिरहिणी बैठी जागू जागत सब सोवै रो आली ।

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तारा गिण-गिण रैन बिहागी सुख की घड़ी कब आवै