कि क्या खरीदना चाहिए और क्या नही खरीदना चाहिए। कबीरदास कहते हैं कि तुम इस संसार रूपी बाजार मे आकर तुमने लाभ का कुछ भी व्यापार नहीं किया अर्थात् तुम शुभ कर्मो को अर्जन बिल्कुल नही कर सकते ।
अलंकार -(।) गूढोक्ति - ले°°°सवारि ।
- (।।) उपमा - जैसी धूवरि मेह, अंजुरी को पानी ।
- (।।।) रूपकातिशयोक्ति - सेवल के फूलन ।
- (।v) अनुप्रास - खोटी खाटै खरा
- (v)रूपक - हाटि ।
विशेष -(।) प्रतीको का प्रयोग है - खोटी, खरा, बनिज ।
(।।) संसार की असारता का वर्णन है ।
(।।।) विषय - लिप्त जीव की भर्त्सना की गई है ।
(।v) घूँवरि मेह । समभाव की अभिव्यक्ति देखे-
- जग नभ-बाटिका रही है फलि फूलि रे ।
- धुवाँ कैसे धौरहर देखि तू न भूलि रे ।
( गोस्वामी तुलसीदास)
(v) सेंबर के फूलन । समभाव के लिए देखें —
- सेमर सुअना सेइया मुइ देंढी की आस ।
- ढी फूट चटाक है अना चला निरास । (कबीर)
( ३१४ )
मन रे रांम नांमहि जांनि ।
थरहरी थूनी परयो मदर सूतौ खूटी तांनि ॥ टेक ॥
सैन तेरी कोई न समझे, जीभ पकरी आंनि ।
पाँच गज दोवटी मॉगी, चुन लीयो सांनि ॥
बसदर पाषर हॉडी, चल्यो लादि पलांनि ।
भाई बध बोलाई बहु रे, काज कीनों आंनि ॥
कहै कबीर या मै झूठ नांहीं, छाडि जिय की बांनि ।
राम नांम निसंक भजि रे, न करि कुल की कांनि ॥
शब्दार्थ-घरहरी = हिलती हुई । थूनी = खम्भा तो = सोता है। खूँटी तानि बेफिक्री के साथ । सैन = इशारा । वैसदर = अग्नि । पलानि = पलायन ।
संन्दर्भ - कबीर संसार की निस्सारता का वर्णन करते हैं । - भावार्थ - रे मन, तू राम-नाम से अपना नाता जोड । इस शरीर रूपी मन्दिर का प्राण-रूपी आधार स्तम्भ हिलने लगा है । यह शरीर रूपी मन्दिर गिरने ही वाला है और तू निश्चिन्त होकर सो रहे हो अर्थात् तुम्हे मौत का ध्यान ही नही है । अन्त समय का वर्णन करते हुए कबीर कहते हैं कि तेरी जीभ को यमदूतों ने आकर पकड़ लिया है अर्थात् तेरा बोल बन्द हो गया है तू अपना मन्तव्य प्रकट करने