जटाजूट बाँध बाध कर मर गये, परन्तु किसी को भी मोक्ष की प्राप्ति नही हुई । कविगण कविता करके मर गये, तीर्थ यात्री केदारनाथ मे जाकर मर गये, जैन मतावलम्बी व्रती साधुओं ने वाख नोच नोच कर प्राण दे दिए, परन्तु इनमें से भी किसी को मोक्ष की प्राप्ति नही हुई । धन एकत्र करते हुए और बहुत सा स्वर्ण बटोरते हुए राजे मर गये, वेदो का अध्ययन करते हुए पंडित मर गये, रूप के अहंकार मे नारियाँ मर गई, परन्तु उद्धार किसी का नही हुआ । जो व्यक्ति भगवान से मिलने की युक्ति जानना चाहते हैं, वे अपने शरीर के भीतर ही भगवान (परम- तत्व) को खोजते हैं । जुलाहा कबीर कहता है कि जो व्यक्ति अपने घर के भीतर भगवान को खोजते हैं उन्हे निश्चित रूप से मोक्ष की प्राप्ति होती है ।
अलंकार -(।) रूपक — संसार धुंध कुहेरा ।
- (।।) पुनरुक्ति प्रकाश = पूजि पूजि, बोधि बोधि, लूचि लूचि ।
- (।।।) वृत्यानुप्रास - कवि कवीनं कविता कापडी, ।
विशेष - (।) धध कुहेरा - "असत् एव अचित्" अभिप्रेत है ।
(।।) वाह्याचार की निरर्थकता प्रतिपादित है ।
(।।।) अह-भावना एव आसक्ति के प्रति तीव्र विरोध व्यक्त है ।
(iv) जुलाहा - जात्याभिमानियो के प्रति व्यंग्य है ।
( ३१८ )
कहू रे जे कहिबे की होइ ।
न को जाने नां को मानं, तार्थ अचिरज मोहि ॥ टेक ॥
अपनें अपने रंग के राजा मानत नांही कोई ।
अति अभिमान लोभ के घाले, चले अपन पौ खोइ ॥
मै मेरी करि यहु तन खोयो, समझत नही गवार ।
भौजलि अधफर थाकि रहे हैं, बुड़े बहुत अपार ॥
मोहि आग्या दई दयाल दया करि काहू कू समझा ।
कहै कबीर मै कहि हार्यो, अब मोहि दोस न लाई ॥
शब्दार्थ – घाले = मारे हुए, वशीभूत । भौजल = भव जल, भवसागर । अघफर = फर = युद्ध-लक्षण से मार्ग ।
संदर्भ - कबीरदास संसार के व्यक्तियों के अज्ञान के प्रति अपना क्षोभ प्रकट करते है ।
भावार्थ - मैं तो वे ही बातें कहता हूँ जो कहने योग्य होती हैं । परन्तु उनको न तो कोई समझता है और न उन पर कोई विश्वास ही करता है । इसी से मुझे आश्चर्य होता है । सभी लोग अपने अपने रंग मे मस्त हैं । इसी लिए कोई मेरी बात को मानता नही है । वे अत्यन्त अभिमान और लोभ के वशीभूत हैं । उन्होंने अपनत्व को खो दिया है अर्थात् वे अपने शुद्ध आत्म-स्वरूप को भूल गये है । ये मूर्ख वास्तविकता तो समझते नहीं हैं । इन्होने "मैं और मेरी" के फेर में ही