(।v) ले मठी उड़ाना - समाधिस्थ चेतना द्वारा वह ब्रह्मलीन हो जाता है-
झल उठी झोली जली खपरा फूटिम फूटि ।
जोगी था सो रमि गया, आसन रही विभूति ।
राग मारू
( ३२० )
मन रे रांम सुमिरि, रांम सुमिरि, रांम सुमिरि भाई ।
राम नांम सुमिरन बिनां, बड़त है अधिकाई ॥ टेक ॥
दारा सुत ग्रह नेह, सपति अधिकाई ।
यामै कछू नांहि तेरौ काल अवधि आई ॥
अजामेल गज गनिका, पतित करम कीन्हां ।
तेऊ उतरि पारि गये, रांम नांम लीन्हां ॥
स्वांन सूकर का कीन्हौ, तऊ लाज न आई ।
राम नांम अमृत छाड़, काहे बिष खाई ।।
तजि भरम करम विधि नखेद, रांम नांम लेहीं ।
जन कबीर गुरु प्रसादि, रांम करि सनेही ॥
शब्दार्थ - नरवेद = निषेध । दारा = स्त्री । करम = कर्म-काण्ड ।
संदर्भ - कबीर राम नाम की महिमा का प्रतिपादन करते हैं।
भावार्थ- रे मेरे भाई मन, राम का स्मरण करो, राम का स्मरण करो, राम का स्मरण करो । राम नाम के स्मरण के बिना इस भव सागर मे और अधिक डूब जाओगे अर्थात् माया मोह मे अधिकाधिक लिप्त होते जाओगे । स्त्री, पुत्र, घर ए इनके प्रति स्नेह तथा अतुल सम्पत्ति इनमे तेरा कुछ भी नही है । अपना समय आने पर ये सब नष्ट हो जाएँगे । अथवा तेरे जीवन की अवधि समाप्ति के निकट आ रही है और ये सब तुझ से छूट जाएँगे । अजामिल, हाथी और पिंगला वेश्या ने नीच कर्म किए । परन्तु राम का नाम लेने से वे भी संसार-सागर के पार हो गए । अर्थात् उनका भी उद्धार हो गया । रे जीव, तुम कुत्ता, सूअर, कौआ आदि जैसी निम्न योनियों मे भटक चुके हो, परन्तु तुमको तब भी पाप कर्म करते हुए शमं नही आती है । तुम राम भक्ति रूपी अमृत को छोड़कर विषयासक्ति रूपी विष का सेवन करते हो । तुम अन्य साधनाओं के द्वारा उद्धार की सम्भावना के भ्रम तथा कर्म काण्ड के विधि-निषेध को छोड़कर राम के नाम का स्मरण करो । भक्त कबीरदास कहते हैं कि तुम गुरु की कृपा प्राप्त करो और भगवान राम के प्रति अनुरक्त हो जाओ ।
अलकार - (।) पुनरुक्ति प्रकाश—राम सुमिरि की आवृत्ति ।
- (।।) गुढोक्ति - तेऊ पार - लीन्हा ।
- (।।।) रूपक - राम नाम अमृत