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पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/७६९

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ग्रन्थावली ]
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( ३२४ )

अब हम जगत गहन ते भागे,
जग की देखि गति रांमहि दूरि लागे ॥ टेक ॥
अयान पर्ने थे बहु बौरानें, संमझि परी तब फिरि पछितानें ।।
लोग कहाँ जाऊँ जो मनि भावै, लहै भुवगम कौन डसावे ।
कबीर बिचारि इहै डर डरिये, कहै का हो इहां नै मरिये ।।

शब्दार्थ - गौहन = गोहन, सग साथ । दुरि लागे = ढुलक गये, झुक गये । अर्यांन==अज्ञान । भुवगम = सर्प, मोह भ्रम ।

सन्दर्भ - कबीरदास ज्ञान-दशा का वर्णन करते हैं । भावार्थ - अब मैं जगत के प्रति आसक्ति को त्याग रहा । संसार का जो दुःख दायी ढग है, उसको देखकर अब मैं भगवान की ओर झुक गया हू । अज्ञान के कारण मैंने माया मोह के वशीभूत होकर अनेक पागलपन के काम किये । परन्तु अब ज्ञान हो जाने पर मैं अपने किए हुए कर्मों पर पश्चाताप कर रहा हूँ । मेरे बारे मे लोग जो चाहें सो कहे । परन्तु मैं अव भगवद्प्रेम के मार्ग को नहीं छोडूंगा । ज्ञान प्राप्त हो जाने पर भ्रम एव मोह रूपी सर्प कोई क्योकर डसावेगा ? कबीर खूब सोच-समझ कर कहते हैं कि विषय-वासना रूपी सर्प के डर से डरते रहना चाहिए । किसी के कहने से क्या होता है ? विपयासक्ति मे फँस कर अपना जीवन नष्ट नही करना चाहिए ।

अलंकार -(।) रूपकातिशयोक्ति - भुवगम ।

(।।) वक्रोक्ति पुष्ट निदर्शना लहे डसावे ।
(।।।) गूढोक्ति - कहै का हो

विशेष -ज्ञान-प्राप्ति के पश्चात् विषयासक्ति का सर्प सदृश भयावह प्रतीत होना सर्वथा स्वाभाविक है । विषयासक्ति और ज्ञानावस्था परस्पर विरोधी हैं । समभाव की अभिव्यक्ति देखे -

मैं अब नाच्यो बहुत गुपाल ।
काम क्रोध को पहिरि चोलना कण्ठ विषय को माल । ( सूरदास)
तथा-अबल नसानी, अब न नर्सहौं ।

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मन मधुकर पन के तुलसी, रघुपति-पद- कमल बसैहौं ।

( गोस्वामी तुलसीदास)

( ३२५ )

राग भैरूं

ऐसा ध्यान धरौ नरहरी,
सबद अनाहद च्यतन करो ॥ टेक ॥
पहली खोजौ पंचे बाइ बाइ व्यंद ले गगन समाइ ॥
गगन जोति तहां त्रिकुटी सधि, रवि ससि पवनां मेला बधि ॥