पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/७७

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६६] [कबीर की साखी


सद्ंर्भ - सतगुरु दिव्यशक्ति से सम्पन्न है। उनकी महत्ता, महिमा अनिर्वच- नीय है। उन्होने अनन्त कृपा करके शिष्य को अपरिमेय शक्ति प्रदान की। भावार्थ - सतगुरु की महिमा अनन्त है। उनकी महत्ता का वर्णन नही हो सकता है। उन्होने शिष्य के प्रति अनन्त उपकार किऐ हैॱ। उन्ही की असीम कृपा से अनन्त अर्थत्-ज्ञान के चक्षु उद्घाटित होगा। उनकी असीम कृपा से अनंत, निराकार निर्विकार ब्रह्य के दर्शन हो गए। शब्दार्थ- अनंत= अनन्त, असीम । उपगार= उपकार। लोचन= नयन। उघाडिया=उघाड,उदघाटित किया। दिखावगहार= दिखानहार=दिखाने वाला।

  राम नाम कै पटंतरै, देबै कौं कुछ नांहि।
  क्या ले गुरु संतोषिए, हौस रही मन माँहि॥४॥

स्ंदर्भ -शिष्य के मन मे असीम कृतज्ञता की भाव है। वह सतगुरु के प्रति प्रतिदान की इच्छा रखता है, पर गुरुदेव के प्रति क्या समर्पित किया जाय यह संकल्प विकल्प मन से साकार रहता है। उसकी अभिलाषा अपूर्ण ही रह गई।

भावार्थ- सतगुरु ने 'रामनाम' जैसी दिव्य वस्तु का दान शिष्य को दिय। शिष्य के पास प्रतिदान के लिए कोई भी उपयुक्त पदार्थ नही है। शिष्य के मन मे हौसला, अभिलापा, आकांक्षा अपूर्ण एवं बलवती बनी हुई है कि सतगुरु के महान व्यक्तित्व की अनुकूल कौन-सी वस्तु प्रतिदान मे दी जाय|

शब्दार्थ- पटंतरै--समान, बराबर| देवै- देने योग्य| कौ- को| ले-दे, देकर| सन्तोपिए--प्रसन्न कीजिए| हौसं=हौसला-इच्छा, आकांक्षा| मनमाहि-मन मे|

   सतगुर के सदकै करूँ दिल श्रपणीं का साछ|
   कलियुग हम स्यूँ लडि पडया मुहकम मेरा बाछ||५||

संदर्भ- सतगुरु सर्वथा प्रशंसनीय है, वंदनीय है| उसकी महती कृपा से शिष्य कलियुग से पराभूत होने से बच गया|

भावार्थ- अपने ह्रदय की समस्त सत्यता को साक्षी करके, पूर्ण मनोयोग मे मैं सदगुरु के चरणों मे अपने को न्योछावर करता है| कलियुग ने पूर्ण गति के साथ मेरे प्रति आक्रमण किया परन्तु मेरी वाछाएं वलशालिनी थी| अत: मैं सदगुरु की कृपा से भवसागर उतीर्ण हो गया|

शब्दार्थ- सदकी= सिद का- बलि जाऊँ, न्यौछावर जाऊ| दिन=ह्रदय| रयूं= से| पड्या= पडा| मुहपम= प्रबल, वलदाली| वाद्ध= वाद्धा, अभिलाया|