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पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/७७१

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ग्रन्थावली ]
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नांहीं देखि न जइये भागि, तहां नही तहाँ रहिये लागि
मन मजन करि दसवै द्वारि, गंगा जमुना सधि बिचारि ॥
नादह व्यंद कि ब्यदहि नाद, नादहि ब्यद मिलै गोब्यंद ।।
गुणातीत जस निरगुन आप भ्रम जेबड़ी जग कीयौ साप ॥
तन नांहीं कब जब मन नांहि, मन परतीत ब्रह्म मन मांहि ॥
परहरि बकुला ग्रहि गुन डार, निरखि देख निधि वार न पार ॥
कहै कबीर गुर परम गियांन, सुनि मंडल मै धरौ धियांन ।।
प्यड परें जीव जैसे जहां, जीवन ही ले राखौ तहां ॥

शब्दार्थ - दसवें द्वारि = ब्रह्मरन्ध्र । जेवडी = रस्सी । बकुला = वल्कल,त्रिगुणात्मक आवरण । ग्रहि = पकडो । गुनडार तात्त्विक गुण ।

सदर्भ - कबीरदास कायायोग की साधना का वर्णन करते हैं ।

भावार्थ - भगवान नरहरि की सेवा इस प्रकार करनी चाहिए कि मन की दुविधाओं का मन त्याग कर दे । जहाँ पर तुमको कुछ भी दृष्टिगोचर नही होता है, वहाँ भी उस तत्त्व वस्तु को पहचानो । उसी अगोचर तत्त्व मे जगत् है । उसको पहचानने का प्रयत्न करो । जहाँ तुमको कुछ भी न दिखाई दे, वहाँ से भागो मत । जहाँ गोचर तत्व न हो, वहाँ उसकी अनुभूति प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील बने रहना चाहिए । (शून्य में विराजमान परमतत्व मे अपना मन रमाओ ) । मन को आसक्ति रहित करके पवित्र करो और उसको ब्रह्मरन्ध्र मे पहुँचा दो । इडा और पिंगला के मिलन-स्थल (त्रिपुटी ) पर ध्यान एकाग्र करो। इस प्रकार ध्यान करो कि नाद-रूप परमतत्व ही सृष्टि तत्व रूप बिन्दु है अथवा बिन्दु ही नाद है । इनमे से कौन सा तत्व-नाद अथवा बिन्दु यथार्थ एव मूल तत्व है । यह भी ध्यान करो कि ये नाद और बिन्दु दोनों गोविन्द (परम प्रभू ) मे ही समाहित हैं । इस स्थिति की प्राप्ति होने पर न देवी-देवता रह जाते हैं और न पूजा एव जप रह जाते हैं, न भाई- बन्धु रह जाते हैं और न माता-पिता ही रह जाते हैं । स्वयं साधक गुणातीत होकर निर्गुण ब्रह्म के समान हो जाता है । यह जगत तो केवल रस्सी मे भ्रम से आरोपित सर्प सदृश ही प्रतीत होने लगता है । जब संकल्प - विकल्पात्मक मन का लय हो जाता है, तब शरीर भी नही रह जाता है । ( उसका पुनर्जन्म नही होता है) । आत्मस्वरूप के प्रति निष्ठा जागने पर ब्रह्म-साक्षात्कार होने लगता है । त्रिगुणात्मक उपाधियों को छोड़कर तात्विक गुण की डाल को पकड़ लो और फिर उस अनन्त परमतत्व के दर्शन करो । कबीर कहते हैं कि परम ज्ञानी गुरू का उपदेश है कि शून्यमण्डल मे अपना ध्यान एकाग्र करो। इस शरीर को छोड़ने पर जीव जिस अवस्था को प्राप्त होता है, उस अवस्था की प्राप्ति इस शरीर द्वारा ही कर लो । भाव यह है कि उपाधि के समाप्त होने पर व्यष्टि चैतन्य जिस परम चैतन्य मे लवलीन हो जाता है, शरीर धारण किए हुए ही जीव- चैतन्य की उसी परम चैतन्य मे प्रतिष्ठा बनाए रखने की साधना ही काम्य है ।