पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/७८

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 गुरुदेव को अग]                                      [६७
         
          सतगुरु लई कमांरग करि, बांहरग लागा तीर ॥
          एक जु बाह्मा प्रीति सूॅ, भीतरि रह्या शरीर ॥६॥
          
       सन्दर्भ- सतगुरु सच्चा सूरमा है। वह शब्दवाण मारने मे अत्यन्त् निपुण
है उसने ऐसा शब्द-वारण मारा कि शिष्य का ममं आहत हो गया और वह तत्व से
पूरगंतया परिचित हो गया ।
       भावार्थ- सतगुरु ने हाथ मे ध्ननुष ग्रहण करके तीर बहाना (दया फेकना)
प्रारम्भ किय। एक तीर जो उसने बडे प्रेम से मेरे प्रति सधान किया,वह मेरे शरीर
मे घर कर गया।
           
       विशेष- प्रस्तुत साखी मे कवि ने सतगुरु को सूरमा के रूप मे व्यक्त किया
है,जो तीर संघान करने मे अत्यन्त कुशल है वह अनवरत रूप से शिष्य के प्रति जो
शब्द-वाण को लक्ष्य करता रहा है। परन्तु एक शब्द-वाण उसने बडे़ हित और प्रेम 
से संघान किया। इस वारग से शिष्य का मर्म आहत हो गया और वह ब्रह्ममय हो गया।
    शब्दार्थ- लई-लो, ग्रहण की। करि=कर--हाथ। वाहण=वहाने अर्थात्-फेकने लगा।
अथार्त-फेकने लगा। बाह्मा=वहाया, फॅफा। सरीर-शरीर।
          सतगुरु सांचा सूरिवां, सवद जु बाह्मा एक।
          लागत ही मैं मिल गया, पडया कलेजै छेक॥७॥
  सन्दर्भ- प्रस्तुत साखो में सतगुरु को एक और विशेषता का उल्लेख किया है।            
वह सच्चा सूरमा है। उसक लक्ष्य अचूक और अत्यन्त प्रभावशाली है। उसका चाण
शब्द-वाण है। शब्द-वाण ने शिष्य के ममं को आहत कर दिया है।
 
   भावार्थ-सतगुरु सच्चा शूरवीर है। उसने मेरे प्रति एक ऐसे शब्द-वाण का अनुसषान
किया, किसके प्रभाव मे मेरा ममं आहन हो गया और मैं मेरा खोया हुआ अपनत्व मुझे
सम्प्रप्त हो गया।
 
   विशेष-- शब्द वाण के लगते ही मेरा खोया हुआ अपनत्व प्राप्त हो गया। तात्पर्य है
कि मैं जो माया के आकर्षक स्वरुप को देखकर आत्म विस्मुर्ण हो गया था, सद्गुरु के
शब्द वाण के लगते ही पुनः आपने खोये हुए पल को प्राप्त हो गया। मै माया से आवृत 
होने के कारण अपने निचितार एय निराकार स्वरुप को विमर गया था पर सतगुरु को ऊपर से प्राप्त हुआ और मै पुनः अपने औदिक रूप मै परिवर्तित हो गया।