विशेष - समभाव के लिए गोस्वामी तुलसीदास का यह कथन देखिए-
बड़े भाग मानुष तन पावा । सुर नर मुनि सद्ग्रन्थन गावा ।
नर तन सम नाहि कवनिउ देही । जीव चराचर जाचत तेही।
'नरक स्वर्ग अपवर्ग निसेनी । ग्यान विराग भगति सुभ देनी ।
सो तनु धरि हरि भजन जे नर । होहि विषय रत मंद मंद तर ।
काच किरिच बदलें ते लेहीं । कर ते डारि परस मनि देहीं ।
(रामचरितमानस)
तथा -हरि, तुम बहुत अनुग्रह कीन्हों ।
साधन-धाम बिबुध-दुरलभ तनु, मोहि कृपा कर दीन्हो ।(विनयपत्रिका )
( ३४६ )
ऐसा ग्यांन बिचारि रे मनां,
हरि किन सुमिरे दुख भंजनां ॥ टेक ॥
जब लग मैं मै मेरी करै, तब लग काज एक नहीं सरै ॥
जब यहु मै मेरी मिटि जाइ, तब हरि काज सवारें आइ ॥
जब लग स्यध र है बन मांहि, तब लग यहु बन फूलै नांहि ॥
उलटि स्याल स्थंघ कूँ खाइ, तब यह फूलै सब बनराइ ॥
जीत्या डूबे हाग्या तिरे, गुर प्रसाद जीत ही मरे ।
दास कबीर कहै समझाइ, केवल रांम रहौ ल्यौ लाइ ॥
शब्दार्थ - भजनाः = नष्ट करने वाला । सरै = सिद्ध हो गया । स्यघ - शेर अहकार फूलै भक्ति भावना का उदय । स्याल चेतन । मरं = जीवनमुक्त ।
सन्दर्भ - कबीरदास अहंकार का त्याग करके राम भक्ति का उपदेश देते हैं ।
भावार्थ - रे मन, तू मन मे ऐसा विवेक धारण करता है । जिससे दुखो का नाश करने वाले प्रभु का भजन होने लगे ? जब तक 'मैं' और मेरी (अभाव) में लिप्त रहोगे, तब तक तुम्हारा एक भी कार्य सिद्ध नहीं होगा । जब यह 'मैं' और 'मेरी' की भावना समाप्त हो जाएगी, तब भगवान स्वयं आकर तुम्हारे समस्त कार्य पूरे कर देंगे । जब तक अन्त करण रूपी वन मे अहंकार रूपी शेर का निवास रहता है, तब तक इस अन्त करण रूपी वन मे भक्ति भावना के फूल विकसित नही हो सकेगे । जब शुद्ध बुद्ध चैतन्य इस अह रूपी सिंह को समाप्त कर देगा, तभी यह अन्त करण रूपी वन ज्ञान और भक्ति को फूलो से युक्त हो जाएगा । इस दशा की प्राप्ति होने पर परिस्थिति एक दम बदल जाएगी। आज तक जिस अहंकार ने चैतन्य को दबा रखा था, वह सदा सर्वदा के लिए नष्ट हो जाएगा और जो चैतन्य अहंकार द्वारा पराभूत था, वह अब सदा-सर्वदा के लिए मुक्त हो जाएगा । इस समय साधक गुरु की कृपा प्राप्त करके जीवनमुक्त हो जाता है । कबीरदास समझा