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पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/८०१

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ग्रन्थावली]
[७९७
 
अलंकार -(।) पुनरुक्ति प्रकाश - प्रथम पक्ति । उठि उठि ।
(।।) रूपकातिशयोक्ति चोट ।
(।।।) रूपक-ररा। पाग। •• रे ।
(।v) गुढोक्ति-क्या गृह रे ।

विशेष-(।) ररा रे— राम नाम की महिमा का प्रतिपादन है । (।।) अजराईल मारै- इस्लामी सस्कारो का प्रभाव है । (।।।) देह सुहाग रे - रहस्यवाद का प्रभाव है । (।v) समभाव के लिए देखे—

(क)जतन वितु मिरगनि खेत उजारे ।
साँचा:**

अपने अपने रस के लोभी , करतव न्यारे-न्यारे ।

xxx

        
वुघि मेरि किरषी , गुरु मेरी बिभुका अक्खिर दोइ रखवारे ।
एवंतोरी गठरी से लागे चोर , बटोहिवा कारे सोवै ।
पाँच - पचीस तीन हैं चोखा , यह सब कीन्हा सोर । —कबीरदास

(ख) शकराचार्य ने भी इन मानवीय दुष्प्रवृत्तियो को डाकू कहा है,जो ज्ञान रूपी रत्न को लूटती रहती है--

काम क्रोधश्च लोभश्च , देहे तिष्ठान्ति तस्करा
ज्ञान रत्नापहाराय तस्स्याजागृत , जागृत ।
(ग) मैं कोहि कहाँ विपति अति भारी । श्री रघुबीर घोर हितकारी ।
मम हृदय भवन प्रभु तोरा । तहँ बसे आई बहु चोरा ।
साँचा:**

                                    
तम, मोह,लोभ,अहकारा । मद,क्रोध बोध-रिपु मारा ।
अति करहिं उपद्रव नाथा । मरदहि मोहि जानि अनाथा ।
मै एक अमिट बटपारा । कोऊ सुनै न मोर पुकारा ।

xxx

                                  
कह तुलसीदास सुनु रामा । लुटहिं तसकर तब धामा ।

(गोस्वामी तुलसीदास विनय पत्रिक)

(३६२)

जगहु रे नर सोवहु कहा,
जम बटपारै रू धै पहा ॥ टेक॥
जागि चेति कछु करौ उपाइ,मोटा बैरी है जमराइ ॥
सेत काग आये बन माहिं,अजहु रे नर चेतै नाहिं ॥
कहैं कबीर तबै नर जागै, जम का डड मूड मै लागै ॥