शब्दार्थ - बीच = अन्तर, भेद बुद्धि । अजाना = अपरिचित । पुरवन = पूरा करने वाले । सन्दर्भ कबीर भगवान से भक्ति की याचना करते हुए कहते हैं । भावार्थ - हे प्रभु । मेरे और आपके बीच मे अभी भी अन्तर है । अर्थात् मैं और आप एकाकार नही हो पाए हैं । तब आपका दर्शन किस प्रकार हो ? परन्तु आपके दर्शनो के बिना भी मेरा हृदय व्याकुल है । मैं भी कुसेवक हूँ अथवा आप भी अज्ञ हैं - मेरी आन्तरिक भावनाओ से परिचित नही हैं ? दोनो ही मे दोष है, हे राम, यह क्यो नही कहते हो ? तुम्हे तीनो लोको का स्वामी कहा जाता है और तुम मन की समस्त इच्छाओ को पूर्ण करने में समर्थ हो । कबीरदास कहते हैं कि हे भगवान, आप मुझे अपने दर्शन दें । या तो मुझे अपने पास बुला लें अथवा आप स्वय ही मेरे पास चले आएँ ।
अलंकार - (।)गूढोक्ति - कैसें तोरा ।
- (।।) सदेह - कुसेवक क्या तुम्हहि अजाना ।
विशेष – आप या तो मुझमें अद्वैत-भावना जगाकर अपने आप मे मुझे लवलीन करले अथवा ऐसी कृपा करे कि मुझे जीवन और जगत मे सर्वत्र आपकी व्यक्त प्रवृत्ति का सरस आभास प्राप्त होने लगे । प्रकारांतर से भक्ति की याचना है ।
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क्यूं लीजै गढ़ बका भाई,
दोवर कोट अरु तेवड़ खाई ।।
काम किवाड़ दुख सुख दरबांनी, पाप पुंनि दरवाजा ।
क्रोध प्रधान लोभ बड़ इंदर, मन मै वासी राजा ॥
स्वाद सनाह टोप ममिता का कुर्बाधि कमांण चढ़ाई ।
त्रिसना तीर रहे तन भीतरि, सुबधि हांथि नहीं आई ॥
प्रेम पलीता सुरति नालि करि, गोला ग्यांन चलाया ।
बुह्य अग्नि ले दिया पलीता एकै चोट ढहाया ॥
सत संतोष ले लरने लागे, तोरे दस दरवाजा ।
साध संगति अरु गुर की कृपा थे, पकरयौ गढ़ कौ राजा ॥
भगवत भीर सकति सुमिरण की, काटि काल की पासी ।
दास कबीर चढ़े गढ़ ऊपरि, राज दियौ अविनासी ॥
शब्दार्थ - क्यू किस प्रकार । गढ = किला, शरीर । वका -- टेढा, दुर्गम कठिन । लीजै = विजय प्राप्त की जाए। दोवर = दोहरा अथवा द्वंत भाव । काठ परकोटा, दीवाल । दोवर कोट= ट - अन्नमय एवं प्राणमय कोष । तेवर = तिहरी । तेवर खाई= तीन खाइयाँ- मनोमय, विज्ञानमय एव आनन्दमय कोप अथवा तीन गुण ।दरवानी = पहरेदारी । दूवर द्वन्द्व । मैवासी नायक, किलेदार । सनाह = सन्नाह = कवच । टोप = शिरस्त्राण । भगवत = भागवत कर्म । पासी पाश ।