अलंकार — (i) साग रूपक' पूरा पद ।
- (ii) रूपकातिशयोक्ति - सुहागिन ।
- (iii) उपमा - विष ( के समान ) । जैसे डाइनि ।
- (iv) विशेषोक्ति की व्यंजना - खसम मरै वा नारि न रोवे ।
विशेष - (।) शाक्त के प्रति विरोध प्रकट है ।
(।।) वाहिर टरी-पिटी । ठीक ही है- भागती फिरती थी
अब जो नफरत हमने दुनियाँ जब तलब करते थे हम । को, वह खुद बखुद आने को है । ( ३७१ ) परोसन मांगे कंत हमारा, पीव क्यू बौरी मिलहि उधारा ॥ टेक ॥ मासा मांगें रती न देऊ, घटे राखि परोसनि लरिका मोरा, जे बन बन दृढ नैन भरि जोऊ, पीव मेरा प्रेम तौ कासनि लेऊं ॥ कछु पाऊं सु आधा तोरा ॥ मिलै तौ बिलखि करि रोऊ ॥ कहै कबीर यहु सहज हमारा, बिरली सुहागनि कंत पियारा ॥
शब्दार्थ - परोसनि = अन्य सांसारिक आत्मा, माया । कत = पति, परमात्मा । वौरी = पागल । कासनि= किससे । पुत्र विवेक ।
सन्दर्भ -कबीर का कहना है कि राम के प्रति सच्चा अनुराग किसी किसी को ही होता है । वह भक्त ज्ञानी एव साधक जीवात्मा के रूप मे अपनी सहजानुभूति को व्यक्त करते हैं ।
भावार्थ— माया रूपी हे पड़ोसन, तुम मुझसे मेरा परमात्मा रूपी पति मांग रही हो ? पर, हे पगली, पति कही उधार मिलता है ? (परमात्मा की प्राप्ति स्वंय साधना करने पर होती है । सिद्धि उधार अथवा किराए पर मिलने वाली वस्तु नही है ।) तुम माशा भर मांगो, मैं रत्ती भर भी नही दूंगी । यदि उधार देने के कारण अथवा यो ही दे देने के कारण, परमात्मा के प्रति मेरे प्र ेम मे भी कभी आ गई है, तो फिर उसकी पूर्ति में कहां से करूंगी ? हे मेरी आत्मा रूपी पडौसिन, तू मेरे कर्म-बन्धन रूप पुत्र की रखवाली कर । ऐसा करने पर परमेश्वर रूपी पति से मुझे जो आनन्द-भक्ति की प्राप्ति होगी, उसमे से आधा तुझको दे दूंगी। मैं बन-वन अर्थात् विभिन्न साधनाओं मे अपने पति को ढूंढ रही हूं और नेत्रों की शक्ति भर उसको चारो ओर देखती फिरती हूँ और प्रियतम के दर्शन होने पर प्रमातिरेक के कारण फूट फूट कर रोती हूँ । कबीर कहते हैं कि अपने परमात्मा रूपी पति से प्र ेम करना जीवात्मा रूपी पत्नी का सहज स्वभाव है । परन्तु फिर भी विरली आत्मा रूपी सौभाग्यवती नारी को अपने परमात्मा रूपी पति से वास्तविक प्रेम होता है ।