पात झड़ता यूँ कहै, सुनि तर-वर वन-राइ।
अब के बिछुड़े ना मिलै, दूरि पड़ेंगे जाइ।(कबीरदास)
राग धनाश्री
(३९८)
जपि जपि रे जीयरा गोब्यंदो, हित चित परमांनदौ रे।
विरही जन कौ बाल हौ, सब सुख आंनदकदौ रे॥ टेक॥
धन धन झीखत धन गयौ, सो धन मिल्यौं न आये रे।
ज्यूँ बन फूली मालती, जन्म अबिरथा जाये रे॥
प्रांणी प्रीति न कीजिये, इहि झूठै संसारो रे।
धूंबां केरा धौलहर, जात न लागै बारो रे॥
माटी केरा पूतला काहे गरब कराये रे।
दिवस चारि कौ पेखनौ, फिरि माटी मिलि जाये रे॥
कांमी रांम न भावई, भावै बिषै बिकारो रे।
लोह नाव पाहन भरी, बूड़त नांहीं बारो रे॥
नां मन मूवा न मरि सक्या, नां हरि भजि उतर्या पारो रे।
कबीरा कंचन गहि रह्यौ, कांच गहै संसारो रे॥
शब्दार्थ—बालहौ=वल्लभ, प्रिय। धौलहर=महल। जात=नष्ट होते हुए। देखनौ=देखना भर।
सन्दर्भ—कबीरदास जीवन की निस्सारता का वर्णन करते है।
भावार्थ—रे जीव, तुम सदैव गोविन्द का भजन करते रहो। उन परमानंद स्वरूप प्रभु में ही अपनी प्रीति और चित्त लगाओ। भगवान विरही भक्तजनो को प्रिय तथा सब प्रकार का सुख एवं आनन्द देने वाले हैं। सासारिक सुख-सम्पत्ति के लिए परेशान होते हुए यह जीवन-रूपी धन नष्ट हो गया और वह भी तुम्हे प्राप्त न हो सका। जिस प्रकार निर्जन वन में फूलने वाली मालती का जन्म व्यर्थ जाता है—वह अपनी सुगन्ध द्वारा किसी को भी उल्लसित नहीं कर पाती है, उसी प्रकार सेवा रहित प्राणी का जन्म व्यर्थ ही चला जाता है। इन सासारिक प्राणिंयो के मोह में मत फँसो। यह समस्त ससारी मिथ्या हैं। ये धुएँ के महल के समान है। इनको नष्ट होते देर नही लगती है। यह शरीर मिट्टी का खिलौना है। यह सहज ही नष्ट हो जाता है। इस पर क्या गर्व करना? यह शरीर तो चार दिन तक देखने भर की शोभा मात्र है। यह तो फिर मिट्टी मे ही मिल जाएगा। विषयासक्त व्यक्ति को राम भक्ति अच्छी नही लगती है, उसको तो विषय रूपी विकार ही अच्छे लगते हैं। विषयी मानव का जन्म पत्थरो से भरी हुए लोहे की नाव के समान है, जिसको डूबते हुए देर नही लगती है। वासनात्मक मन न कभी मरा और न कभी मर सकेगा। विषयी व्यक्ति हरि का भजन करके कभी पार भी नहीं उतर सके हैं। कबीरदास कहते हैं कि मैंने तो हरि भक्ति रूपी सुवर्ण का आश्रय ले लिया है। इन