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पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/८५५

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ग्रन्थावली]
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विषयी-प्राणियो ने विषयासक्ति रूपी काच के टुकडे को पकड़ रखा है। (ये कितने मूर्ख हैं।)

अलंकार—(i) पुनरुक्तिप्रकाश—जपि जपि। धन धन।
(ii) अनुप्रास—जपि जपि जीयरा। मन मूवा मरि।
(iii) पदमैत्री—हित चित।
(iv) यमक—धन धन।
(vi) उपमा—ज्यूँ बन फूली मालती।
(vii) दृष्टान्त—धुवा केरा वारो रे।
(viii) गुढोक्ति—काहे गरव कराये रे।
(ix) रूपक—विषय-विकार।
(x) विशेषोक्ति—ना हरि भजि उतर्या पारो रे।
(xi) रूपकातिशयोक्ति—कचन, काच।

विशेष—(i) ससार की निस्सारता एव क्षण भगुरता का काव्यात्मक वर्णन है।

(ii) निर्वेद सचारी की व्यजना है।

(iii) ज्यू बन जाये रे—समभाव की अभिव्यक्ति देखें=

सो अनन्य गति जाकें मति न टरइ हनुमत।
मै सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवत।

(गोस्वामी तुलसीदास)

(iv) धूवा केरा धौलहर वारो रे। —तुलना कीजिए—

जग-नभ-बाटिका रही है फलि फूलि रे।
धुवाँ कैसे धौरहर देखि तु न भूलि रे।

(विनय पत्रिका, तुलसी)

(३९९)

न कछु रे न कछू रांम बिनां।
सरीर धरें को रहै परंमगति, साध संगति रहनां॥ टेक॥
मंदिर रचत मास दस लागे, बिनसत एक छिनां।
झूठे सुख के कारनि प्रांनीं, परपच करत घनां॥
तात मात सुत लोग कुटब मै, फूल्यो फिरत मनां।
कहै कबीर रांम भजि बौरे, छांड़ि सकल भ्रमनां॥

शब्दार्थ—घना=बहुत। प्रपच=फैलाव।

सन्दर्भ—कबीर संसार की असारता का वर्णन करते हैं।

भावार्थ—भगवान की भक्ति के बिना कुछ भी नही है, कुछ भी नही है (जीवन निस्सार है) शरीर धारण करने की सार्थकता साधुओ की संगति मे रहना है। इस शरीर रूपी मन्दिर को बनने मे दस महीने लगते हैं, परन्तु यह एक क्षण