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पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/८५९

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ग्रन्थावली]
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भावार्थ—लोगो की बुद्धि भोली है—वे सहज ही हरेक बात पर विश्वास कर लेते हैं। कबीर कहते हैं कि यदि काशी में शरीर छोडने पर मोक्ष की प्राप्ति हो जाए, तो फिर मोक्ष के लिए राम से कोई प्रार्थना क्यो करे। पहले हम भी अंधविश्वासों में फँसे हुए थे, परन्तु अब उनसे मुक्त होकर इस प्रकार की विवेक पूर्ण बातें करने लगे हैं। अन्ध विश्वास से मुक्त होकर सच्ची ईश्वर-भक्ति के प्रति उन्मुख हो जाना ही इस मानव-जीवन की सार्थकता है। जैसे जब एक बार जल में प्रविष्ट हो जाने पर फिर बाहर अलग नही निकाला जा सकता है—वह उसके साथ एक रस हो जाता है, उसी प्रकार यह जुलाहा कबीर भक्ति से द्रवित होकर ब्रह्म के साथ एकाकार हो गया। राम भक्ति में जिसका प्रेम है और राम-चरणो मे जिसका चित्त लगा हुआ है, उसके लिए इस प्रकार की अद्वैतावस्था की प्राप्ति कोई आश्चर्य की बात नही है। गुरु की कृपा और साधु सगति के प्रभाव से निम्न जाति जुलाहा में उत्पन्न यह कबीर जीवन-मुक्त हो रहा है। कबीर कहते है कि हे संतो, सुनो। कोई भी किसी प्रकार के भ्रम में न रहे। अगर भगवान के प्रति सत्य निष्ठा है, तो अवश्य मोक्ष की प्राप्ति होगी। फिर चाहे काशी में शरीरात हो, चाहे मगहर में।

अलंकार—(i) पर्यायोक्ति—जो कासी निहोरा।
(ii) उदाहरण—ज्यूँ जुलाहा।
(iii) वक्रोक्ति—ताकी अचिरज काहा?
(iv) अनुप्रास—जग जीतै जाइ जुलाहा।
(vi) व्यतिरेक की व्यजना—जग जीतै जाइ जुलाहा।

विशेष—(i) अघ विश्वास का खण्डन है।

(ii) कबीर के 'मगहर' वास वाली बात की पुष्टि होती है।

(iii) 'जुलाहा' शब्द मे सवर्ण जाति पर कटाक्ष है। नीच जाति में जन्म लेकर भी कनीर ने मोक्ष प्राप्त करली और बडे-बडे धर्म ध्वज रह गये। ठीक कही है—

जाति पाँति पूछै ना कोई। हरि कौ भजै सो हरि कौ होई।

तथा—

भगतिवंत अति नीचउ प्रानी। मोह प्रानप्रिय असि मम वानी।

(४०३)

ऐसी आरती त्रिभुवन तारै,
तेज पुंज तहाँ प्रांन उतारै॥ टेक॥
पाती पंच पहुप करि पूजा, देव निरजन और न दूजा।
तनमन सोस समरपन कीन्हां, प्रगट जोति तहा आतम लीनां॥
दीपक ग्यांन सबद धुनि घटा, पर पुरिख तहां देव अनंता।
परम प्रकास सकल उजियारा, कहै कबीर मै दास तुम्हारा॥