सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/८६१

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।

 

रमैंणी

दृष्टव्य—रमैनी को रामणी अथवा 'रामायण' का बिगडा रूप माना गया है। रमैनियो की रचना दोहा-चौपाइयों में की गई है। कबीर की रमैनी के वर्ण्य विषय हैं—स्तुति-वर्णन, उपदेश-वर्णन अथवा लोकोपकार का निरूपण आदि।

राग सूहौ

तू सकल गहगरा, सफ सफा दिलदार दीदार॥
तेरी कुदरत किनहूंन जानीं, पीर मुरीद काजी मुसलमानी।
देवी देव सुर नर गण गध्रप, ब्रह्मा देव महेसुर॥
तेरी कुदरति तिनहूं न जांनी॥ टेक॥

शब्दार्थ—गहगरा=गहगहा, प्रफुल्ल, आनन्द से युक्त। सफ सफा=स्वच्छ एव उज्ज्वल। दीदार=साक्षात्कार स्वरूप। कुदरति=माया अथवा सृष्टि। पीर=धर्मगुरु। मुरीद=चेला। काजी=मौलवी। मुसलमानी=मुसलमान सम्बन्धी।

सन्दर्भ—कबीर भगवान की महिमा का वर्णन करते हैं।

भावार्थ—हे भगवान तुम तुम्हारा दर्शनपूर्ण आनन्द स्वरूप, स्वच्छ एवं उज्ज्वल तथा प्रेमास्पद है। किसी में भी तुम्हारी लीला (सृष्टि के रहस्य) को नही जाना है। मुसलमानो में सिद्ध या धर्मगुरु (पीर), चेले, न्यायकर्त्ता विचारक (काजी) कहे जाने वाले, तथा देवी देवता, सुर, नर, गंधर्व, ब्रह्मा, महेश्वर आदि कोई तेरी लीला को नहीं समझ पाए हैं।

अलंकार—सम्बोधितशयोक्ति—सम्पूर्ण छन्द।

[१] एकपदी रमैणी
(१)

काजी सो जो काया बिचांरै, तेल दीप मैं बाती जारै॥
तेल दीप मै बाती रहै, जोति चीह्नि जे काजी कहै॥
सुलनां बंग देइ सुर जांनी, आप मुसला बैठा तांनीं॥
आपुन मै जे करै निवाजा, सो मुलना सरबत्तरि गाजा॥
सेब सहज मै महल उठावा, चद सूर विचि तारी लावा॥
अर्ध उर्ध बिचि आनि उतारा, सोई सेष तिहूं लोक पियारा॥

८५७