(iii) जस अनभै कथिता तिनि तैसा। तुलना करें—
जाकी रही भावना जैसी। प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।
तथा—अमित रूप प्रगटे तेहि काला। जथाजोग मिले सर्बाहि कृपाला।
(गोस्वामी तुलसीदास)
(iv) सगुण भक्तो जैसे दैन्य की मार्मिक अभिव्यक्ति है।
(१३)
जिनि यहु सुपिनां फुर करि जांनां, और सबै दुखयादि न आंनां।,
ग्यांन होन चेतै नहीं सुता, मै जाग्या विष हर भै भूता॥
पारधी बांन रहै सर सांधें, विषम बांन मारै विष बांधें॥
काल अहेड़ी संझ सकारा, सावाज ससा सकल ससारा॥
दावानल अति जरें बिकारा, माया मोह रोकि ले जारा॥
पवन सहाइ लोभ अति भइया, जम चरचा चहुँदिसि फिरि गइया॥
जम के चर चहुँ दिसि फिरि लागे, हंस पखेरूवा अब कहां जाइबे।
केस गहैं कर निस दिन रहई, जब धरि ऐंचे तब धरि चहई॥
कठिन पासि कछू चलै न उपाई जम दुबारि सीझे सब जाई॥
सोई त्रास सुनि रांम न गावै, मृगत्रिष्णां झूठी दिन धावै॥
मृत काल किनहूँ नही देखा, दुख कौं सुख करि सबही लेखा॥
सुख करि मूल न चीन्हसि अभागी, चीन्है बिनां रहै दुख लागी॥
नींब काट रस नींब पियारा, यूं बिष कूं अंमृत कहै ससारा॥
बिष अंमृत एकै करि सांनां, जिनि चीन्ह्यां तिनही सुख मांनां॥
अछित राज दिन दिनहि सिराई, अमृत परहरि करि विष खाई॥
जांनि अजांनि जिन्है बिष खावा, परे लहरि पुकारै धावा॥
विष के खांयें का गुंन होई, जा बेद न जानै परि सोई॥
मुरछि मुरछि जीव जरिहै आसा, कांजी अलप बहु खीर बिनासा॥
तिल सुख कारनि दुख अस मेरू चौरासी लख लीया फेरू॥
अलप सुख दुख आहि अनता, मन मैगल भूल्यौ मैमता॥
दीपक जोति रहै इक सगा, नैन नेह मांनू परै पतगा॥
सुख बिश्रांम किनहू नहीं पावा, परहरि काल दिन आइ तुरावा॥
लालच लागे जनम सिरावा, अंति काल दिन आइ तुरावा॥
जब लग है यह निज तन सोई, तब लग चेति न देखै कोई॥
जब निज चलि करि किया पयांनां, भयौ अकाज तब फिरि पछितांनां॥
मृगत्रिष्णां दिन दिन ऐसी, अबमोहि कछू न सौहाइ।
अनेक जतन करिये, टारिये, करम पासि नहीं जाइ॥
शब्दार्थ—फुर=सत्य। विषहर=विषधर। भूता=भयभीत होकर भाग जाते है। सकारा=सवेरे। सावज=मृगयायोग्य पशु। पारधी=शिकारी। ससा=