पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/९५

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     ८४]                                           [ कबीर की साखी
        
      भावार्थ--कबीरदास कहते है कि मैं यह बराबर केहता जा रहा हुँ और 

सब मेरा कथन सुनते जा रहे है | राम कहने से, जपने से ही कल्याण होगा । अन्यथा कल्याण नही होगा|

         विशेष--"कबीर......हूँ" से तात्पर्य है कि कबीर अनुभव तथा द्दढ 

विश्वास को प्रकट कर रहे है | (२) सुंणता है.......कोई = से तात्पर्य है सब मेरे कथन को सुन रहा है । (३) राम.....होई = राम नाम जप ही कल्याण का स्त्रोत है । उनके अभाव मे माया के विकार अपना प्रभाव प्रसारित करते जायेंगे ।

         शब्दार्थ--सुणता = सुनता । तर = तो । भला = कलयाण ।
              कबीर कहै मैं कथि गया, कथि गया ब्रह्म महेस ।
              राम नाँव ततसार है, सब काहू उपदेश ॥२॥
         सन्दर्भ--विगत साखी मे कबीर ने कहा है "कबीर केह्ता जात हुँ सुणता 

है सब कोइ।" यहाँ पर कबीर ने उसी भाव को पुन: व्यकत किया है कि जो मैं कह रहा हुँ वह परम्परागत या सनातन सत्य है । वह सत्य ब्रह्मा और महेश द्वारा भी समर्पित है । संसार मे राम नाम ही तत्व सार है ।

         भावार्थ--कबीर कहते है कि मैं यह कह चुका हूँ और यही मेरा सब को उपदेश है कि संसार मे राम नाम ही तत्व और सार वस्तु हैँ । यही ब्रह्या और महेश का भी कयन है ।
         विशेष--प्रस्तुत साखी मे कवि ने परम्परागत चिर समर्थित सत्य की अभि-

व्यक्ति की है । कबीर नाम के महत्व के सम्बन्ध मे परम्परागत सत्य को प्रकट करते हुए उसके महत्व को उपदेश के रूप मे व्यक्त करते हैं | राम नाम समस्त साधना का तत्व और सार है |

         (२) सत दरिया ने भी इसकी प्रस्तुत विशेषता की ओर संकेत करते हुए 

कहा है "राम नाम निजु सार है |" कबीर दास दरिया के शब्दो का समर्थन करते हुए केहते है "नाम सरोवर सार है सोह सुरत लगाय"|

         शब्दार्थ--कथि = कहि | नवि = नाम | तत = तत्व | काहू = को | कहै = 

कहता है |

               तत तिलक तिहुँँ लोक मैं, राम नाँव निज सार |
               जन फबीर मस्तक दिया, सोभा अधिक अपार ॥३॥
         सन्दर्भ--संसार मे राम नाम समस्त साधना का तत्व है । बारम्बार कबीर 

ने इसी भाव पर बल दिया है । जीवन और व्यक्तित्व नाम के सम्पर्या से और भी अधिक सुशोभित हो गया ।