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कुंइयों से मिल जाता था। इस बीच उखड़-उजड़ चुकी कई कुंइयां फिर से ठीक की जा रही हैं।
कुंइयां सचमुच स्वयंसिद्ध और समयसिद्ध साबित हो रही हैं।
बहते पानी को ठहरा कर वर्ष भर निर्मल बनाए रखने वाली कुंडी की पहली झलक हमें सन् ८८ में सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायर्नमेंट के श्री अनिल अग्रवाल और सुश्री सुनीता नारायण के साथ दिल्ली से बीकानेर जाते समय दिखी थी। फिर कुंई की तरह इसे भी समझने में हमें काफी समय लगा है।
कुंडी शब्द कुंड से और कुंड यज्ञ कुंड से बना माना जाता है। जैसलमेर जिले में बहुत पुराना बैसाखी कुंड भी है, जहां आसपास के बहुत बड़े क्षेत्र से लोग अस्थियां विसर्जन के लिए आते हैं। कहा जाता है कि बैसाखी पूर्णिमा को यहां स्वयं गंगाजी आती हैं। ऐसी कथाएं कुंड के जल की निर्मलता, पवित्रता बताती हैं।
कुंड बनाने की प्रथा कितनी पुरानी है, ठीक ठीक कहा नहीं जा सकता। बीकानेर-जैसलमेर क्षेत्र में दो सौ-तीन सौ बरस पुराने कुंड, टांके भी मिलते हैं। नई तकनीक हैंडपंप को भी टिकाने वाले कुंड चुरू क्षेत्र में खूब हैं। कुंडियों का समयसिद्ध और स्वयंसिद्ध स्वभाव हमें जनसत्ता, दिल्ली के श्री सुधीर जैन ने समझाया।
फोग की टहनियों से बनी कुंडियां बीकानेर जिले की सीमा पर पाकिस्तान से सटे जालवाली गांव में हमें श्री ओम थानवी और राजस्थान गो सेवा संघ के श्री भंवरलाल कोठारीजी के कारण देखने मिलीं। इन कुंडियों पर सफेद रंग पोतने का रहस्य श्री ओम थानवी ने समझाया।
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