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नीतिरक्षाका उपाय

नीतिरक्षाका उपाय नीरोगी होता है। अर्थात् ज्यो-ज्यो आत्मा नीरोग-निर्विकार होती जाती है, त्यो त्यो शरीर भी नीरोगी होता जाता है। लेकिन यहा नीरोगी शरीरके मानी बलवान शरीर नही है। बलवान आत्मा क्षीण शरीरमे ही वास करती है। ज्यो-ज्यो आत्मबल बढता है, त्यो त्यो शरीरकी क्षीणता बटती है। पूर्ण नीरोगी शरीर बिलकुल क्षीण भी हो सकता है। बलवान शरीरमे बहुत अशमै रोग रहते है। रोग न हो, तो भी वह शरीर सक्रामक रोगोका शिकार तुरन्त हो जाता है। परन्तु पूर्ण नीरोग शरीर पर झुनका असर नहीं हो सकता । शुद्ध खूनमे जैसे जन्तुओको दूर रखनेका गुण होता है। .. ब्रह्मचर्यका लौकिक अथवा प्रचलित अर्थ तो अितना ही माना जाता है मन, वचन और कायाके द्वारा विषयेन्द्रियका सयम । यह अर्थ वास्तविक है। क्योकि असका पालन करना बहुत कठिन माना गया है। स्वादेन्द्रियके सयम पर अतना जोर नही दिया गया, अिससे विषयेन्द्रियका सयम ज्यादा मुश्किल बन गया है-- लगभग असभव हो गया है। __ मेरा अनुभव तो असा है कि जिसने स्वादको नहीं जीता, वह विषयको नहीं जीत सकता। स्वादको जीतना बहुत कठिन है। परन्तु स्वादकी विजयके साथ ही विषयकी विजय बधी ही है। स्वादको जीतनेके लिजे अंक अपाय तो यह है कि मसालोका सर्वथा अथवा जितना हो सके अतना त्याग किया जाय । और दूसरा अधिक बलवान अपाय हमेशा यह भावना बढाना है कि भोजन हम स्वादके लिअ नही, बल्कि केवल शरीर-रक्षाके लिओ करते है। हवा हम स्वादके लिअ नही, बल्कि श्वासके लि लेते है। पानी जैसे हम प्यास बुझानेके लिओ पीते है, असी प्रकार खाना महज भूख बुझानेके लि खाना चाहिये। दुर्भाग्यसे हमारे मा-बाप लडकपनसे ही हममे जिससे अलटी आदत डालते है। हमारे पोषणके लिअ नहीं, बल्कि अपना झूठा दुलार दिखानेके लिओ, वे हमे तरह-तरहके स्वाद चखाकर हमारी आदत बिगाडते है। हमे घरके असे वायुमडलके खिलाफ लड़नेकी आवश्यकता है। परन्तु विषयको जीतनेका स्वर्ण नियम रामनाम अथवा दूसरा कोसी जैसा मत्र है। द्वादश मत्र* भी यही काम देता है। अपनी-अपनी भावनाके आराधनाके द्वारा अस स्थितिमे पहुचना पडता है। ---हिन्दी नवजीवन, ६-४-१९२४॥

  • ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।