पृष्ठ:Ramanama.pdf/२०

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रामनाम "यह क्यो?" विलकिनसन अिस सवादको ध्यानपूर्वक सुन रहे थे। अन्होने कहा "यह अिसलि कि हम निरन्तर निर्माण ही करते रहते है।" गाधीजी “अिसलिये कि हम निरन्तर पूर्णताके लिने प्रयत्न करते रहते है। केवल क ीश्वर ही पूर्ण है, मनुष्य कभी पूर्ण नहीं होता।" हरिजनसेवक, २५-५-१९३५ मुंहसे रामनाम जपना सवाल-- दूसरेसे बातचीत करते समय, मस्तिष्क द्वारा कठिन कार्य करते समय या अचानक पैदा होनेवाली घबराहट वगैराके समय भी क्या हृदयमे रामनामका जप हो सकता है? अगर जैसी दशामे भी लोग करते है, तो कैसे करते है ? ___ जवाब- अनुभव कहता है कि मनुष्य किसी भी हालतमे हो, चाहे सोता भी क्यो न हो, लेकिन अगर असे आदत हो गी है और रामनाम हृदयस्थ हो गया है, तो जब तक हृदय चलता है, तब तक रामनाम हृदयमे चलता ही रहना चाहिये । वर्ना यह कहा जायगा कि मनुष्य जो रामनाम लेता है, वह असके कठसे ही निकलता है या असने सिर्फ हृदयके स्तरको ही छुआ है, लेकिन हृदय पर असका साम्राज्य स्थापित नही हुआ है। यदि रामनामने हृदयका स्वामित्व पा लिया हो तो जप कैसे करते है, यह सवाल पूछा ही नही जा सकता। क्योकि जब वह हृदयमे स्थान ले लेता है, तब अच्चारणकी आवश्यकता ही नही रह जाती। लेकिन यह कहना ठीक होगा कि अिस तरह जिनके हृदयमे रामनाम बस गया है, जैसे लोग बहुत कम होगे। जो शक्ति रामनाममे मानी गयी है, असके बारेमे मुझे कोसी शक नही है। हरओक आदमी अिच्छा मात्रसे ही रामनामको अपने हृदयमे अकित नहीं कर सकता। असके लिजे अथक परिश्रम और धीरजकी जरूरत है। पारसमणिको पानेके लि धीरज और परिश्रम क्यो न हो? रामनाम तो अससे भी ज्यादा कीमती, बल्कि अमल्य है। हरिजनसेवक, १७-२-१९४६