पृष्ठ:Ramanama.pdf/२५

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रामनामका प्रचार मुझे यह प्रतीत होता है कि रामनामकी महिमाके बारेमे मुझे अब कुछ नया सीखना बाकी नहीं है, क्योकि मुझे असका अनुभव-ज्ञान है। और अिसीलिमें मेरा यह अभिप्राय है कि खादी और स्वराज्यके प्रचारकी तरह रामनामका प्रचार नही हो सकता। अिस कठिन कालमे रामनामका अलटा जप होता है। अर्थात् बहतसे स्थानोमे केवल आडम्बरके लिओ, कुछ स्थानोमे अपने स्वार्थ के लिअ और कुछ जगहोमे व्यभिचार करनेके लिओ जिसका जप होता हुआ मैने देखा है। यदि केवल असके अलटे अक्षरोका ही जप हो, तो असके बारेमे मुझे कुछ भी नहीं कहना है। यह हमने पढा है कि शुद्ध हृदयके लोगोने अलटा जप जपकर भी मुक्ति प्राप्त की है। और अिसे हम मान भी सकते है। लेकिन शुद्ध अच्चारण करनेवाले पापी पापकी पष्टिके लिये रामनामके मत्रका जप करे, तो अिसे हम क्या कहेगे। अिसीलिों में रामनामके प्रचारसे डरता है। जो लोग यह मानते है कि भजन-मडलीमें बैठकर राम- नामकी रट लगानेसे, शोर करनेसे ही भूत, भविष्य और वर्तमानके सब पाप नष्ट हो जायेगे और कुछ भी करना बाकी न रहेगा, अन्हे तो दूरसे ही नमस्कार करना चाहिये। अनका अनुकरण नही किया जा सकता। अिसलिमे जो रामनामका प्रचार करना चाहता है, असे स्वय अपने हृदयमे ही असका प्रचार करके असे शुद्ध कर लेना चाहिये और अस पर रामका साम्राज्य स्थापित करके असका प्रचार करना चाहिये। फिर असे ससार भी ग्रहण करेगा और लोग भी रामनामका जप करने लगेगे । लेकिन हर किसी स्थान पर रामनामका जैसा-तैसा भी जप करना पाखडकी वृद्धि करना है और नास्तिकताके प्रवाहका वेग बढाना है। हिन्दी नवजीवन, १९-११-१९२५