पृष्ठ:Ramanama.pdf/२६

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१४ मेरा राम जब गाधीजीसे पूछा गया कि गैर-हिन्दू रामधुनमें कैसे भाग ले सकते है, तब अन्होने कहा “जब कोली यह अतराज अठाता है कि रामका नाम लेना या रामधुन गाना तो सिर्फ हिन्दुओके लिओ है, मुसलमान असमे किस तरह शरीक हो सकते है , तब मुझे मन-ही-मन हसी आती है। क्या मुसलमानोका भगवान हिन्दुओ, पारसियो या जीसाअियोके भगवानसे जुदा है? नही, सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी मीश्वर तो अक ही है। असके की नाम है, और असका जो नाम हमे सबसे ज्यादा प्यारा होता है, अस नामसे हम असको याद करते है। “मेरा राम, हमारी प्रार्थनाके समयका राम, वह अतिहासिक राम नही है, जो दशरथका पुत्र और अयोध्याका राजा था। वह तो सनातन, अजन्मा और अद्वितीय राम है। मै असीकी पूजा करता हूँ। असीकी मदद चाहता है। आपको भी यही करना चाहिये। वह समान रूपसे सब किसीका है। अिसलिओ मेरी समझमे नही आता कि क्यो किसी मुसलमानको या दूसरे किसीको असका नाम लेनेमे अतराज होना चाहिये? लेकिन यह कोसी जरूरी नहीं कि वह रामके रूपमे ही भगवानको पहचाने-असका नाम ले। वह मन-ही-मन अल्लाह या खुदाका नाम भी अिस तरह जप सकता है, जिससे असमे बेसुरापन न आवे।" हरिजनसेवक, २८-४-१९४६ १८